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क़ैद रहा ...

वादा
अल्फ़ाज़ की क़बा में
क़ैद रहा

किरदार
लम्हों की क़बा में
क़ैद रहा

प्यार
नज़र की क़बा में
क़ैद रहा

इश्क
धड़कनों की क़बा में
क़ैद रहा

कश्ती
ढूंढती रही
किनारों को
तूफ़ां
शब् की क़बा में
क़ैद रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 673

Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 27, 2017 at 3:12pm

आदरणीया  Arpana Sharma जी सृजन के भावों को अपने स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 27, 2017 at 3:11pm

आदरणीय   MANINDER SINGHजी प्रस्तुति के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 27, 2017 at 3:10pm

आदरणीया  Arpana Sharma जी सृजन के भावों को अपने स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by MANINDER SINGH on April 27, 2017 at 2:02pm

बहुत बढ़िया सर....

Comment by Arpana Sharma on April 26, 2017 at 9:43pm
रूहानी जज़्बातों को पिरोये सुंदर रचना।
Comment by Sushil Sarna on April 26, 2017 at 5:07pm

आदरणीय शिज्जु शकूर साहिब सृजन को भावों को मान देने का हार्दिक आभार। आपके इस सूक्ष्म सुझाव का हार्दिक आभार। मैं आपसे सहमत हूँ. अभी इसे पुनः संशोधित कर प्रेषित करता हूँ। ऐसा ही स्नेह बनाये रखें सर।

Comment by Sushil Sarna on April 26, 2017 at 5:04pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan जी प्रस्तुति के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2017 at 4:08pm
आ. सुशील सरना जी अच्छी रचना है, बधाई आपको। एक बात मगर कहना चाहूँगा कि अल्फ़ाज़ अपने आप में बहुवचन है उसे अल्फ़ाजों कहना ठीक नहीं है।
Comment by narendrasinh chauhan on April 26, 2017 at 2:28pm

 खूब सुन्दर रचना 

Comment by Sushil Sarna on April 26, 2017 at 12:45pm

आदरणीय  सतविन्द्र कुमार जी प्रस्तुति के भावों को मान देने का हार्दिक आभार। 

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