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बेशर्मी से ... (क्षणिका )...

बेशर्मी से ... (क्षणिका )

अन्धकार
चीख उठा
स्पर्शों के चरम
गंधहीन हो गए
जब
पवन की थपकी से
इक दिया
बुझते बुझते
बेशर्मी से
जल उठा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 758

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Comment by Sushil Sarna on April 27, 2017 at 3:08pm

आदरणीया  Arpana Sharma जी सृजन के भावों को अपने स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on April 27, 2017 at 3:08pm

आदरणीया प्रतिभा जी प्रस्तुति में निहित भावों को अपने आत्मीय सम्मान से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Arpana Sharma on April 26, 2017 at 9:53pm
अंधेरों की दरकार में दिये के जलने की ठीठता .... भावपूर्ण क्षणिका की बधाई ।
Comment by pratibha pande on April 26, 2017 at 8:54pm

आदरणीय समर कबीर जी वाली जिज्ञासा मेरे मन में भी थी ,पर आपका जवाब पढ़कर उसके आलोक में जब रचना पढ़ी तो बस वाह ही निकली ...हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी 

Comment by pratibha pande on April 26, 2017 at 8:54pm

आदरणीय समर कबीर जी वाली जिज्ञासा मेरे मन में भी थी ,पर आपका जवाब पढ़कर उसके आलोक में जब रचना पढ़ी तो बस वाह ही निकली ...हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी 

Comment by Sushil Sarna on April 24, 2017 at 8:19pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan   जी प्रस्तुति आपकी मन मुदित करती प्रशंसा की तहे दिल से शुक्रगुजार है। 

Comment by narendrasinh chauhan on April 24, 2017 at 4:45pm

सुन्दर 

Comment by Sushil Sarna on April 24, 2017 at 2:47pm

आदरणीय समर कबीर साहिब अपनी संतुष्टि से सृजन का मान बढ़ाने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on April 24, 2017 at 2:37pm
जी,ठीक है ।
Comment by Sushil Sarna on April 24, 2017 at 2:10pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का शुक्रिया।  सर इसमें मेरा आशय स्पर्शों के चरम जिन्हें अन्धकार की ज़रूरत थी उस वक्त पवन की थपकी से उसका उस चरम क्षण पे फिर जल कर रोशनी करना एक नटखट सी बेशर्मी है कुछ ऐसा ही आशय था मेरा इस क्षणिका में। आशा है अब आप संतुष्ट होंगे।  प्रस्तुति को अपने विचारों से शोभित करने का हार्दिक आभार। 

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