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ग़ज़ल नूर की- नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,

122/122/122/12 
.
नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,
सफ़ाई न दे हम को बेकार में.
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फ़क़त एक मिसरे में गीता सुनो
है संसार मुझ में, मैं संसार में.
.
ये तामीर-ए-क़ुदरत भी कुछ कम नहीं
हिफ़ाज़त से रक्खा है गुल, ख़ार में.
.
कहानी को अंजाम होने तो दो
सभी लौट आयेंगे किरदार में.
.
ऐ ज़िल्ल-ए-ईलाही!! ये इन्साफ़ हो,
कि चुनवा दो शैख़ू को दीवार में.
.
तू शिद्दत से माथा पटक कर तो देख
कोई दर निकल आये दीवार में.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 14, 2017 at 8:14pm
एक और बेहतरीन ग़ज़ल..सादर
Comment by Samar kabeer on May 14, 2017 at 7:59pm
जनाब निलेश 'नूर'साहिब आदाब,हमेशा की तरह उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 14, 2017 at 10:17am

शुक्रिया आ. चन्द्रशेखर भाई...
सलीम उर्फ़ शैख़ू  को ही...ताकि अनारकली को इन्साफ मिल सके ..
सादर 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on May 14, 2017 at 9:59am

ऐ ज़िल्ल-ए-ईलाही!! ये इन्साफ़ हो,
कि चुनवा दो शैख़ू को दीवार में. 
नूर साहब क्या बात है, लाजवाब शेर है. वैसे किसको दीवार में चिनवा रहे हैं ?

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 14, 2017 at 9:50am

शुक्रिया आ. सुरेन्द्रनाथ सिंह साहब 

Comment by नाथ सोनांचली on May 14, 2017 at 9:29am
कहानी को अंजाम होने तो दो
सभी लौट आयेंगे क़िरदार में.
अच्छा व्यंग, वाह नीलेश भाई जी

तू शिद्दत से माथा पटक कर तो देख
कोई दर निकल आये दीवार में.
क्या कहने, अच्छा तंज कसा आपने

आद0 नीलेश भाई जी आपकी सोच की गहराई को नमन, बधाई इस सृजन पर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 7:51pm

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 13, 2017 at 4:13pm

आदरणीय आपके एक से बढ़कर एक रंग देखने को मिल रहे हैं हर रचना की तरह बेमिशाल रचना गीता वाला शेर तो कमाल का है ही 

तू शिद्दत से माथा पटक कर तो देख 
कोई दर निकल आये दीवार में.ये शेर तो बहुत ही भाया

आपको पढ़कर हमेशा नयी सोच को पंख लगते हैं ढेरों बधाईयाँ आपको 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 12:37pm

 शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब 

Comment by Mohammed Arif on May 13, 2017 at 11:50am
वाह कमाल!वाह कमाल !!कितनी ख़ूबसूरत बारिशें हो रही है बारिश के पहले । धुआँधार ग़ज़लों की बारिश । हर ग़ज़ल अपनी पिछली ग़ज़ल से बेहतर । लाजवाब, बेजोड़-बेमिसाल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद आदरणीय नीलेश जी ।

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