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ग़ज़ल --इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह )

(2122-2122-2122-212)

पहले सूरज सा तपें खुद को ज़रा रोशन करें
फिर थमें मत फिर किसी को चाँद सा रोशन करें।

ये नहीं, कोई दिया बस इक दफ़ा रोशन करें
गर करें, बुझने पे उसको बारहा रोशन करें।

मेरी भी वो ही तमन्ना है जो सारे शह्र की
आप मेरे घर में आएं घर मेरा रोशन करें।

सामने है इक चराग़ और आप के हाथों में शमअ
आप किस उलझन में हैं जी?क्या हुआ? रोशन करें!

तीरगी के हैं नुमाइंदे सभी इस शह्र में
कौन है ये अजनबी?किस ने कहा रोशन करें

        (मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by Gurpreet Singh jammu on May 26, 2017 at 4:45pm

आदरणीय आशुतोष जी,, कोशिश को सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 26, 2017 at 4:44pm

शुक्रिया आदरणीय सुनील प्रसाद जी,, कोशिश रहेगी आपके कहे मुताबिक लेखनी को निखारने की 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 26, 2017 at 4:43pm

शुक्रिया आदरणीय अनुराग जी 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 26, 2017 at 4:42pm

शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 25, 2017 at 7:23pm
आदरणीय गुरुप्रीत जी आपकी यह ग़ज़ल मुझे बेहदपसंद आयी इस ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on May 25, 2017 at 3:44pm
गजल पर बेहतर प्रयास है आपका कथ्यों को सीधे सरल वाक्य में रखने का और प्रयास की आवश्यकता है जिससे रवानगी में और निखार आएगी मेरी बधाई स्वीकार करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2017 at 8:14pm

आदरनीय गुरप्रीत भाई , गज़ल अच्छी हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें । गज़ल पर आदरनीय नीलेश भाई कह ही चुके हैं .. उनकी बातों का खयाल कीजियेगा ।

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 23, 2017 at 6:57pm
शुक्रिया आदरणीय समर कबीर सर जी..आपकी प्रतिकिया का हमेशा बेसब्री से इंतज़ार रहता है
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 23, 2017 at 6:55pm
आदरणीय गजेन्द्र जी...शुक्रिया
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 23, 2017 at 6:55pm
आपका दिल से शुक्रिया आदरणीय सुशील सरना जी

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