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सच का चोगा पहना दो - शिज्जु शकूर

सच का चोगा पहना दो
झूठ का परचम लहरा दो

इसमें है साख तुम्हारी
कि सियारों को रँगवा दो

सच न ज़मीं तक आ जाए
सबको बाहम उलझा दो

लिखा हुआ है काग़ज़ पर
सच में भी वो दिखला दो

पहले जैसा था मेरा
घर वैसा अब लौटा दो

सबकुछ अच्छा-अच्छा है
अख़बारों में छपवा दो

ये भी आज चलन में है
सारे अहसान भुला दो

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on June 3, 2017 at 3:08pm

//ये भी आज चलन में है
सारे अहसान भुला दो//

अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 7:30am

सच का चोगा पहना दो
झूठ का परचम लहरा दो

इसमें है साख तुम्हारी
कि सियारों को रँगवा दो

वाह क्या बात कही है आपने आदरणीय सिज्जू भैया | बहुत प्यारी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई |

Comment by Shyam Narain Verma on May 30, 2017 at 4:18pm
वाह ! बहुत खूब | सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई
Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2017 at 10:03am

आदरणीय शिज्जु शकूर जी बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2017 at 10:03am

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 29, 2017 at 9:44pm
वाह आदरणीय बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई..सादर
Comment by Mohammed Arif on May 28, 2017 at 7:55pm
आदरणीय शिज्जू शकूर जी आदाब, छोटी बह्र वाली बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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