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22 22 22 22
झूठ बहुत तुमने बोले हैं
भाव सभीने ही तोले हैं।1

नासमझी का दामन पकड़े
छोड़े तुमने बस गोले हैं।2

कर्त्ता हो,बलिहारी समझो,
शब्दों के पीछे झोले हैं।3(झटके)

निज करनी मत पर्दा डालो,
राज कहाँ हमने खोले हैं?4

लिंग-वचन नियमित रहने दो,
कथ्य बहुत क्यों कर डोले हैं?5

चाहे कुछ भी कर लोगे क्या?
तथ्यों के अपने झोले हैं।6(झोलियाँ)

तुमने कुछ समझा है?,बोलो-
शेर बने क्या मुँहबोले हैं?7
@'मौलिक व अप्रकाशित'

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Comment by Manan Kumar singh on June 23, 2017 at 8:46am
आभारी हूँ आदरणीया।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 7:25am

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय मनन कुमार जी हार्दिक बधाई |

Comment by Manan Kumar singh on June 1, 2017 at 12:32pm
आभार आदरणीय गुरप्रीत जी।
Comment by Manan Kumar singh on June 1, 2017 at 12:32pm
आभार आदरणीय शर्मा जी।
Comment by Manan Kumar singh on June 1, 2017 at 12:30pm
आभार आदरणीय बृज जी।
Comment by Gurpreet Singh jammu on June 1, 2017 at 9:45am

बहुत खूब आदरणीय मनन जी,, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2017 at 9:58am

 बहुत खूब आदरणीय Manan Kumar singh जी 

Comment by Manan Kumar singh on May 29, 2017 at 10:40pm
आभार आदरणीय बृज जी।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 29, 2017 at 9:48pm
बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..सादर

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