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अनकहा ...

कुछ तो
रहने दिया होता
मन की कंदराओं में
करवटें लेता
कोई भाव
अनकहा

क्या
ज़रूरी था
स्मृति पृष्ठ की
यादों को
नयन तीरों का
पता देना

आखिर
पता लग गया न
ज़माने को
सब कुछ
जो दबा के रखा था
दिल में
इक दूजे से
बांटने के लिए
सांझा दर्द
अनकहा

सांझ
कब तलक
तिमिर को रोकती
प्रतीक्षा की रेशमी डोरी
प्रभात की तीक्षण रश्मियों से
कमज़ोर पड़ने लगी
मैं उनींदीं सी
आधी जागी
आधी सोयी
अपने अधरों पे
छोड़ दिया
तुम्हारे स्पर्श से
जीवित करने के लिए
वो प्रणय शब्द
जो तुम्हारी प्रतीक्षा में
रह गया था
अनकहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 25, 2017 at 2:38pm

आ. विजय नोकोर साहिब सृजन के भावों को प्रशंसित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2017 at 2:38pm

आ.डॉ. गोपाल जी भाई साहिब आपके मुखारविंद से निकले आशीर्वचनों से सृजन उपकृत हुआ।  हार्दिक आभार सर। 

Comment by vijay nikore on June 24, 2017 at 11:10am

//सांझ 
कब तलक 
तिमिर को रोकती 
प्रतीक्षा की रेशमी डोरी 
प्रभात की तीक्षण रश्मियों से 
कमज़ोर पड़ने लगी //

सुन्दर भावों से भरपूर रचना पढ़ कर आनन्द आ गया। हार्दिक बधाई, सुशील जी।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 23, 2017 at 9:27pm

सुन्दर ! अति सुन्दर , सुकुमार भावों के  धनी हैं आप आ० सरना  जी

Comment by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 6:44pm

आदरणीय मो. आरिफ साहिब सृजन को अपनी मधुर प्रशंसा से शोभित करने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on June 23, 2017 at 6:44pm

आदरणीय  narendrasinh chauhan जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार।

Comment by Mohammed Arif on June 23, 2017 at 2:47pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाभ, बहुत ही सुंदर भावों की 'अनकही'। हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by narendrasinh chauhan on June 23, 2017 at 1:17pm

बहोत खूब 

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