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धीरे-धीरे नदियाँ रेत बन गईं / कविता

धीरे-धीरे
नदियाँ रेत बन गईं
हरे-भरे खेतों में
ऊँची-ऊँची
अट्टालिकाएँ तन गईं
घरों में अनबन की
दीवारें खड़ी हो गईं
जीते जी बूढ़ी माँ
भुखमरी की निशानी बन गईं
मौसम सनकी
पागल जैसे हो गए
बारिश अब दूर की कौड़ी हो गई
देश
किसान आत्म हत्या का
रोज़ उत्सव मना रहा है
सरकार की
झूठी सफलताओं में
करोड़ों बहाए जा रहे हैं
सरकारी
आँकड़ों में
ग़रीबी रोज़ घट रही है
सरकार की
उद्योगपतियों के साथ
अच्छी पट रही है
किसान
आत्महत्या की
फहचान बन गया है
कर्ज़, भुखमरी की
शान बन गया है
जीते जी उसे
खाद-बीज, भूमि से
वंचित किया जा रहा है
आत्महत्या
करने पर
करोड़ों का
मुआवज़ा दिया जा रहा है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on July 2, 2017 at 1:08pm
आदरणीय विजय निकोर जी आदाब, आपकी टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया । हार्दिक आभार ।
Comment by vijay nikore on July 2, 2017 at 8:18am

वर्तमान स्थिति पर सुन्दर कविता लिखी है। हार्दिक बधाई, आदरणीय आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on June 28, 2017 at 5:05pm
बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on June 28, 2017 at 12:51pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब,आज के हालात पर सुंदर कविता हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Mohammed Arif on June 27, 2017 at 7:51pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, आपको रचना पसंद आई मेरा लेखन सार्थक हुआ । आप जैसे गुणीजनों की इस्लाह से हमारी लेखनी में सुधार होता है । मैं अभी सुधार कर लेता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on June 27, 2017 at 7:46pm
आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी आदाब, आपको रचना पसंद आई लेखन सार्थक हुआ । हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया ।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on June 27, 2017 at 5:42pm
वाहहहह मोहम्मद आरिफ जी आपने अपनी कविता में पर्यावरण बुजुर्ग और किशान की बद से बदतर होती हालत पर बहुत अच्छा प्रकाश डाला है। हृदय से बधाई।
Comment by Samar kabeer on June 27, 2017 at 2:35pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,देश की समस्याओं पर अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
15वीं पंक्ति में 'बना रहा है' को "मना रहा है" करना उचित होगा,इसी तरह 18वीं पंक्ति में 'करोड़ों बहाया जा रहा है' को "करोड़ों बहाए जा रहे हैं" करना उचित होगा ।
Comment by Mohammed Arif on June 27, 2017 at 2:16pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 27, 2017 at 11:47am
आदरणीय आरिफ जी सुन्दर कविता हुई..सादर

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