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'अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो'

मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन
ख़ुलूस-ओ-प्यार की उनसे उमीद कैसे हो
जो चाहते हैं कि नफ़रत शदीद कैसे हो

छुपा रखे हैं कई राज़ तुमने सीने में
तुम्हारे क़ल्ब की हासिल कलीद् कैसे हो

बुझे बुझे से दरीचे हैं ख़ुश्क आँखों के
शराब इश्क़ की इनसे कशीद् कैसे हो

हमेशा घेर कर कुछ लोग बैठे रहते हैं
अदब पे आपसे गुफ़्त-ओ-शुनीद कैसे हो

इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर
अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो
----
शदीद-सख़्त
क़ल्ब-दिल
कलीद्-चाबी
कशीद्-खींचना
गुफ़्त-ओ-शुनीद-बात चीत
पलीद-गन्दा,ग़लीज़
समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 4, 2017 at 9:43pm
जनाब श्याम किशोर सिंह साहिब आदाब,मैं अपनी ग़ज़ल के साथ मुश्किल शब्दों के अर्थ इसी लिये लिख देता हूँ कि जो पाठक उर्दू नहीं जानते उनको ग़ज़ल समझने में आसानी हो ।
सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 4, 2017 at 9:11pm

श्रीमान समर कबीर साहब, सादर नमस्कार!

यूँ तो मुझे उर्दू का सतही ज्ञान भी नहीं है, जो थोड़ा बहुत है वो फ़िल्मी गीतों, और गज़लों को सुनकर ही हुआ है। ऐसे में आपका ये तरीका बेहतर है कि भारी शब्दों के अर्थ लिख दिए जाएँ ताकि हम जैसे लोग भी समझ पाएँ और गाहे - बगाहे उर्दू शब्दों का प्रयोग भी कर पाएँ। इस प्रयास के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।

Comment by Samar kabeer on August 1, 2017 at 5:55pm
जनाब उपाध्याय जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 1, 2017 at 1:32pm

"इसी जतन में लगे हैं हज़ारहा शाइर
अदब की मुल्क में मिट्टी पलीद कैसे हो"
वाह वाह ! शानदार ग़ज़ल !! बधाई स्वीकार करें  Samar kabeer साहब | 

Comment by Samar kabeer on August 1, 2017 at 11:11am
जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by surender insan on August 1, 2017 at 9:24am
आदाब मोहतरम समर कबीर साहब । साथ में कुछ शब्दों के अर्थ होने से ग़ज़ल का पूरा आनंद आया।बेहद लाजवाब ग़ज़ल हुई जी। इस ग़ज़ल के होने की कहानी भी पढ़ी है । जिसे आपने चैलेंज की तरह लिया और बेहद ख़ूबसूरती से पूरा किया । आपका 27 साल पहले का मतला भी लाजवाब है जी। बहुत बहुत दिली मुबारक़बाद कबूल करे जी।
Comment by Samar kabeer on July 25, 2017 at 9:46pm
जी,ये तो मेरा फ़र्ज़ है, शुक्रिया ।
Comment by Ravi Shukla on July 25, 2017 at 9:01pm
आदरणीय समर साहब हमारे अनुरोध पर आपने इतनी विस्तृत टिप्पणी दे कर जो मान दिया और गजल के पीछे की कहानी से अवगत कराया उसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर
Comment by Samar kabeer on July 24, 2017 at 1:59pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by vijay nikore on July 24, 2017 at 11:42am

वाह ! इतनी दिलकश गज़ल । आप से यही उमीद रहती है और आप इस उमीद को पूरा करते हैं।

आपको ढेरों बधाई, आदरणीय भाई समर कबीर जी।

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