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ठिकाना (लघुकथा)राहिला

हुलिए से वह बूढ़ा कोई भिखारी जान पड़ रहा था। अलसुबह मंडी लगते ही हाथ में एक मैली कुचैली सी प्लास्टिक की बोरी लिये वह एक ठेले वाले के पास पहुँचा| आदतन फलवाले ने उसकी तरफ एक छोटा सा आम बढ़ा दिया।
उम्मीद से परे बूढ़े ने सिर हिलाकर उसे लेने से इंकार कर दिया और एक तरफ छाँटकर रखे सड़े आमों की ओर इशारा किया। दुकानदार ने उसे हैरानी से देखा और इस बार एक बड़ा आम उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा "अरे बाबा! वे आम तो सड़े हुए हैं ,उन्हें खाओगे तो बीमार पड़ जाओगे।
बूढ़े ने इस बार भी इंकार में सिर हिला दिया| अब एक गूंगे के इशारे वाचने जितना समय नहीं था दुकानदार के पास।
लिहाजा उसने भाड़ में जाने वाले अंदाज में सारे सड़े फल उठा कर बूढ़े को देते हुए कहा "ले बाबा ! ले जा ,सारे ले जा।"
अपने मन की होते देख बूढ़े की झुर्रियों से ढकीं आंखे मुस्कुराहट के कारण एकदम से गायब सी हो गई।

अब बारी -बारी कई दुकानदारों से सड़े हुए फल लेकर बूढ़े ने भरी हुई बोरी को कंधे पर टाँग लिया| सामने से आ रहे ऑटो रिक्शा के नजदीक आते ही उसने हाथ के इशारे से रोका| चालक के कुछ पूछने से पहले ही बूढ़े ने उसमें बोरा रखकर चलने का इशारा किया| फिर बूढ़ा रास्ता दिखता गया, ऑटो वाला चलता गया।

शहर से काफी दूर आने पर चालक ने पलटकर पूछा 'बाबा आगे तो दस पन्द्रह किलोमीटर दूर कोई गाँव ही नहीं हैं।आपको जाना कहाँ है?"उसकी व्याकुलता देख ,बूढ़े ने उसे फिर इशारे से तसल्ली दी।
यह नई सड़क थी, जो कुछ महीनों पहले ही एक योजना के तहत बनाई गयी थी।
तभी बूढ़े ने ऑटो वाले की पीठ थपथपा कर ऑटो धीमा चलाने को कहा और बोरी में हाथ डालकर सड़े फलों को सड़क के दोनों किनारों पर दम से फेंकने लगा
"अरे -अरे पगला गए क्या?"ऑटो वाले ने चिल्लाते हुए झटके से ऑटो रोक दिया।
अब बूढ़ा पहली बार धीरे से बोला "चले चलो भाई !अभी बहुत से बीज बिखेरने हैं।"
ऑटो वाला उसे बोलता देख बुरी तरह चौंक गया और बोला
"आप बोल सकते हो तो पहले सब बात इशारे से क्यों ?" जवाब में बूढ़ा काँपती हुई आवाज़ में बोला "बेटा जो बात इशारे में बन गई वह बोलने से ढेरों सवाल उठाती।अब इतना तो समझ गए हो कि मैं क्या कर रहा हूँ।तो चले चलो भाई!"
नई सड़क की बलि चढ़े हजारों वृक्षों के कब्रिस्तान को आबाद करने के लिए बूढ़ा फिर से बीजों को उनके सही ठिकाने पर पहुंचाने लगा।


मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 23, 2017 at 9:00am

कमाल  कमाल  आपकी इस उर्वर सोच का और क्या शानदार प्रस्तुति , बहुत बहुत बधाई

Comment by Rahila on July 22, 2017 at 11:26am
शुक्रिया आद.दीदी!सादर
Comment by Nita Kasar on July 21, 2017 at 9:17pm
सारगर्भित संदेशप्रद कथा है,आज की ही नही अपने कल की व्यवस्था करना ज़रूरी है ।जिससे आने वाली पीढ़ी के लिये उदाहरण सामने हो ।बधाई आद० राहिला जी ।
Comment by Rahila on July 21, 2017 at 6:01pm
शुक्रिया आ. दिदिया!
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 18, 2017 at 8:14pm

वाह यह निराली कोशिश पसंद आई आदरणीया राहिला जी | अच्छी तरकीब हुई यह तो पेड़ लगाने की | हार्दिक बधाई 

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