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ग़ज़ल....यार तुम भी कमाल करते हो-बृजेश कुमार 'ब्रज

2122 1212 22
रहबरों से सवाल करते हो
तौबा ये क्या मजाल करते हो

रस्मे उल्फत की बात कर बैठे
काम सब बेमिसाल करते हो

हीर समझा हुई ग़लतफ़हमी
खुद क्यों रांझे सा हाल करते हो

आइने में ये किसकी सूरत है
किसपे दिल ये निहाल करते हो

किसने साये को साथ रक्खा है
किस लिये 'ब्रज' मलाल करते हो
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 4, 2017 at 11:30pm
आदरणीय सतविंद्र जी आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं आभार..
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 4, 2017 at 6:24pm
जनाब ब्रजेश कुमार साहिब ,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। शेर के दोनों मिसरों में राब्ता क़ायम होना बहुत ज़रूरी होता है ,मुहतरम समर साहिब के मश्वरे का संज्ञान ज़रूर लें ।
Comment by Samar kabeer on August 4, 2017 at 6:04pm
जनाब बृजेश कुमार'ब्रज'साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'यार तुम भी कमाल करते हो'
ये मिसरा एक फ़िल्मी गाने का है:-
"प्यार करते हो यार
करके डरते हो यार
यार तुम भी कमाल करते हो"
'हीट समझा हुई ग़लत फ़हमी
ख़ुद का रांझे सा हाल करते हो'
क्या बात हुई ?मफ़हूम साफ़ नहीं,दोनों मिसरों में रब्त नहीं है ।
'किस्से बातें सँभाल करते हो'
इस मिसरे में क़ाफ़िया काम नहीं कर रहा है ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 4, 2017 at 5:40pm
बहुत् खूब आदरणीय बृजेश जी,

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