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तो क्या हुआ (लघुकथा)

घर के बाहर खुले आंगन में चेहरा लटका कर बैठे देख उसकी माँ ने उसके पास जाकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "परेशान मत हो, अगली बार बेटा ही होगा।"

 

"नहीं माँ, अब बस। दो बच्चे हो गए हैं, तीसरा होने पर इन दोनों बच्चियों की परवरिश भी अच्छी तरह नहीं कर पाऊंगा।" वहीँ पालने में सो रही अपनी नवजात बेटी को देखते हुए उसने उत्तर दिया।

 

माँ के पीछे-पीछे तब तक आज ही हस्पताल से लौटी अंदर आराम कर रही उसकी पत्नी को तरह-तरह के निर्देश देकर कुछ और महिलायें भी बाहर आ गयीं थीं। उनमें से एक ने सिर नचाते हुए कहा, "ऊपर वाले की मर्जी होगी तो बुढ़ापे की लाठी आ ही जायेगा।"

 

दूसरी महिला भी कहाँ पीछे रहने वाली थी, उसने आँखें छोटी कर कहा, "वंश को बढ़ाना तो है ही..."

 

उसने उत्तर दिया, “नहीं ऐसी कोई बात नहीं... मेरी तो बेटे की सिर्फ इच्छा थी, वंश और बुढ़ापे का इससे क्या...”

 

"क्या पहले जांच नहीं करवाई थी?" तीसरी महिला ने उसकी बात काट कर भवें मचकाते हुए समझदारी भरे स्वर में कहा।

 

वह हल्का सा चौंका और उस महिला से पूछा, "कैसी जांच?"

 

महिला फुसफुसाते हुए बोली "जिससे पता चल जाता है कि लड़का है या लड़की?"

 

सुनते ही वह सख्त शब्दों में बोला, “पता चल जाता तो फिर...?”

 

“तो फिर...” लड़खड़ाते शब्दों में कहते वह महिला उससे आँख चुराने लगी।

 

और उसी समय उसकी नवजात बेटी ने ज़ोर की किलकारी मारी।

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 30, 2017 at 11:57am

आप सभी आदरणीयजनों का रचना पर टिप्पणी कर मेरी हौसला अफज़ाई और मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत आभार

Comment by Mohammed Arif on August 7, 2017 at 8:48am
आदरणीय चंद्रेश जी आदाब , सकारात्मक को बढ़ाने और सोचने पर विवश करती कथा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2017 at 10:55pm
// “पता चल जाता तो फिर...?” // .. तो फिर क्या ये महिलाएं उसकी पत्नी को कुछ देसी 'घरेलू नुस्ख़े' सुझातीं गर्भपात के या कन्या जन्मते ही कुछ हिंसात्मक कर गुजरने के पारंपरिक तरीक़े सुझातीं; जिस तरह की अभी-अभी कुछ समझा कर बाहर आयीं थीं? महिलाओं के कटाक्षपूर्ण संवादों के जवाब में पति के तीखे सवाल के पुनः उत्तर में किये गये सवाल के जवाब ने पाठकों को सोचने पर मज़बूर कर दिया। बहुत बढ़िया प्रस्तुति के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी जी। दूसरी सन्तान बेटी ही हुई, तो क्या हुआ? सकारात्मक संदेश वाहक रचना।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 4, 2017 at 6:16pm
जनाब चंद्रेश कुमार साहिब ,सुंदर लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
Comment by Samar kabeer on August 4, 2017 at 6:11pm
जनाब चन्द्रेश कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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