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चलो फिर यादों के सफ़र पर......संतोष

चलो फिर यादों के सफ़र पर हो आते हैं ,
तन्हाई का ये दौर कुछ देर को भूल आते है

बिखरे हमारे ख़्वाबों को ग़र सवाँरना हो तो,
चलो आज फिर उनसे मुलाक़ात कर आते हैं

ख़्वाबों में ही सही मगर थे हमसफ़र कभी,
यही ऐहसास को फिर पैकर किये आते है

ये कैसा मरज है कि दिलों से जाता ही नहीं,
दिल अफ़्सुर्दा है क्यूँ तुम्हारा ये भी जान आते है

सोचा नहीं था कि फिर सामना होगा तुमसे,
बिखरे ख़्वाबों का एक नया आईना बना आते हैं

उम्मीद आज भी फ़क़त ईतनी है तुमसे,
बैठो ज़रा क़रीब से फ़ासला सदियों का मिटा आते है

यूँ तो तेरे हिज़्र का सदमा मुझे आज़ार किये है,
ज़िंदगी भी गिराबार है,यही बताने चले आते हैं

गुज़रे वक़्त पर गुफ़्तगू में वक़्त तो लगेगा'संतोष'
हिसाब जो मजबूरियों का है फिर वही कर आते है

~संतोष खिरवड़कर
[मौलिक एवं अप्रकाशित]

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Comment

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Comment by santosh khirwadkar on August 8, 2017 at 11:22am

आदरणीय रवि जी नमस्कार , आप बिल्कुल सही कह रहे हैं ,किन्तु हम जैसे नविन प्रशिक्षुओं के लिए आप के मुताबिक निचे उल्लेखित जानकारी वास्तव में बिलकुल ही समझ नहीं आती , इस मंच से एवं इस सन्देश के माध्यम से आग्रह पूर्वक निवेदन चाहूंगा कि इन तकनिकी /बारीकियों के जानकारी हेतु कार्यशालाओं का आयोजन अति आवश्यक भी है और अपेक्षित भी !!!

Comment by Ravi Shukla on August 8, 2017 at 9:52am

आदरणीय संतोष जी आपकी रचना का स्‍वागत है अगर इसेगजल के रूप में आपने प्रस्‍तुत किया है तो अरूज के मुताबिक ये गजल नहीं है ।इसमें काफिया ही नहीं है और आप ने इसका अरकान भी रचना से पहले नहीं लिखा जिससे इसकी बहर पहचानने में सहूलियत हो ।

ये मंच का अनुशासन भी है । अगर गजल पर अभ्‍यास करना चाहें तो मंच पर गजल की कक्षा और गजल की बातें दो स्‍थान है जहां विस्‍त़त जानकारी उपलब्‍ध है सादर ।

Comment by santosh khirwadkar on August 7, 2017 at 8:05pm

शुक्रिया आ. आरिफ़ साहब...... 

Comment by santosh khirwadkar on August 7, 2017 at 8:04pm

शुक्रिया सुरेंद्र जी .......

Comment by santosh khirwadkar on August 7, 2017 at 8:02pm

प्रणाम सहित शुक्रिया आ. समर साहब , आप के दिए इस मार्गदशर्न अनुसार अवश्य ही दुरुस्त कर लूँगा .........
ह्रदय से आभार !!

Comment by vijay nikore on August 7, 2017 at 1:09pm

रचना अच्छी लगी। बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on August 7, 2017 at 8:06am
आद0 सन्तोष जी सादर अभिवादन, अच्छी कविता लिखी है। आपने, समर साहब के विचारों से सहमत हूँ, आपको बधाई
Comment by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 11:17pm
आदरणीय संतोष जी आदाब, बेहतरीन प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम जनाब समर कबीर साहब की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by Samar kabeer on August 6, 2017 at 6:46pm
जनाब संतोष जी आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी ग़ज़ल नुमा कविता,सुंदर भाव सजाए हैं आपने,इस प्रस्तुति पर,बधाई स्वीकार करें ।
'यूँ तो तेरे हिज्र का सदमा मुझे आज़ार किये है'
इस पंक्ति को यूँ कर लें:-

'यूँ तो तुम्हारे हिज्र का सदमा मुझे आज़ार दिये है'
और इसके नीचे की पंक्ति को यूँ कर लें :-
'ज़िन्दगी भी गिरांबार है यही बताने चले आते हैं'

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