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ग़ज़ल " जिंदगी से जी भर गया कब का "

2122 1212 22

ज़िन्दगी,जी तो भर गया कब का।
टूट कर मैं बिखर गया कब का ।।

***
इक मुहब्बत का था नशा मुझको।
वो नशा भी उतर गया कब का।।
***
चाहता था तुझे दिल-ओ-जां से।
वक़्त वो तो गुज़र गया कब का।।

***
देख हालत नशे के मारों की।
ख़ुद-ब-ख़ुद वो सुधर गया कब का।।

***
देख कर छल फ़रेब दुनिया के।
एक "इंसान" मर गया कब का।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by surender insan on August 20, 2017 at 8:26pm
जी आदरणीय गुरप्रीत जी बेहद शुक्रिया जी। सादर नमन सँग आभार जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 8:16pm
आदरणीय नीरज जी बेहद शुक्रिया जी आपका। जी सही कहा जी आदरणीय समर साहब की सलाह हमेशा उम्दा होती है जी। सादर जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 8:05pm
जी बेहद शुक्रिया आद. ब्रजेश कुमार जी। सादर नमन जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 8:04pm
जी आदरणीय गिरिराज भंडारी भाई जी बेहद शुक्रिया जी। आदरणीय समर कबीर साहब की सलाह अनुसार मिसरा सही करता हु जी। बहुत बहुत आभार जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 8:01pm
जी आदरणीय समर कबीर साहब जी आपके सुझाव के अनुसार मिसरा सही करता हूँ जी। सादर नमन सँग आभार जी आपका।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 7:57pm
जी आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी बेहद शुक्रिया जी आपका। सादर नमन सँग आभार जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 7:56pm
जी बेहद शुक्रिया आपका आदरणीय रवि शुक्ला जी। सादार नमन सँग आभार जी। जी।
Comment by surender insan on August 20, 2017 at 7:54pm
जी बेहद शुक्रिया आपका आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब जी।सादर नमन सँग आभार जी।
Comment by Gurpreet Singh jammu on August 14, 2017 at 12:27pm

आदरणीय सुरेंद्र इंसां जी,,बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने,,,मकता विशेष तौर पर बेहद पसंद आया 

Comment by Niraj Kumar on August 13, 2017 at 4:54pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी,

उम्दा ग़ज़ल हुयी है दाद के साथ मुबारकबाद.

और उतनी ही उम्दा है जनाब समर कबीर साहब की इस्लाह.

सादर 

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