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ग़ज़ल - रोशनी है अगर तेरे दिल में- ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   112/22

गर अँधेरा है तेरी महफिल में

हसरत ए रोशनी तो रख दिल में

खुद से बेहतर वो कैसे समझेगा ?

सारे झूठे हैं चश्म ए बातिल में

क़त्ल करने की ख़्वाहिशों के सिवा

और क्या ढूँढते हो क़ातिल में

 

बेबसी, दर्द और कुछ तड़पन

क्या ये काफी नहीं था बिस्मिल में ?

 

फ़िक्र क्या ? बाहरी जिया न मिले

रोशनी है अगर तेरे दिल में

 

कोई तो कोशिश ए नजात भी हो

अश्क़ बारी के सिवा मुश्किल में

 

साहिलों सा नही है साहिल अब

कोई तूफाँ छिपा है साहिल में

 

प्यार का क्या सबूत दूँ उनको

ज़ह’न के जो बसे हैं तिल तिल में

 

हर तगाफ़ुल मिला जो तुमसे मुझे

जुड़ गया ज़िन्दगी के हासिल में      

*************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:59pm

आदरणीय रवि भाई , उत्साह व्रर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।

आदरनीय नज़रे बातिल पर आपत्ति का कारण आ. समर भाई बता चुके हैं , कृपया देख लीजियेगा ।

कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:57pm

कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।

आदरनीयबड़े भाई विजय निकोरे जी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:55pm

कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।

आ. बृजेश भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:54pm

अदरनीय सुरेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।

कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:52pm

आदरणीय समर भाई , चश्मे बातिल किये जाने के कारणों क विस्तार से बताने के लिये आपका हार्दिक आभार ।

कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:50pm

आ. आशुतोष भाई - कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।

गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार , आदरनीय ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2017 at 7:49pm

आ. नीरज भाई , कुछ घरेलू व्यस्तताओं के कारण आभार व्यक्त देरी से कर रहा हूँ , क्षमा कीजियेगा ।

गज़ल की सराह्ना के लिये आपका हार्दिक आभार । आदरनीय नज़रे बाति पर आपत्ति का कारण आ. समर भाई बता चुके हैं , कृपया देख लीजियेगा ।

Comment by vijay nikore on August 23, 2017 at 5:19pm

बहुत ही खूबसूरत गज़ल कही है। बधाई, आदरणीय गिरिराज जी।

Comment by surender insan on August 15, 2017 at 7:42pm
साथ ही सार्थक चर्चा भी पढ़ी जी। सादर जी।
Comment by surender insan on August 15, 2017 at 7:41pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आदाब। बेहद खूबसूरत गजल के लिए बहुत बहुत बधाई हो जी ।

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