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ग़ज़ल - अब हक़ीकत से ही बहल जायें ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   22 /122
मंज़रे ख़्वाब से निकल जायें

अब हक़ीकत से ही बहल जायें

 

ज़ख़्म को खोद कुछ बड़ा कीजे

ता कि कुछ कैमरे दहल जायें

 

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब

कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

 

मेरे अन्दर का बच्चा कहता है  

चल न झूठे सही, फिसल जायें

 

शह’र की भीड़ भाड़ से बचते

आ ! किसी गाँव तक निकल जायें

 

दूर है गर समर ज़रा तुमसे

थोड़ा पंजों के बल उछल जायें

 

चाहत ए रोशनी में दम है अगर

जुगनुओं की तरह से जल जायें   

*****************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vandana on October 15, 2017 at 3:49pm

ज़ख़्म को खोद कुछ बड़ा कीजे

ता कि कुछ कैमरे दहल जायें

बहुत ग़ज़ब का व्यंग्य बहुत बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय 

Comment by Ajay Tiwari on October 15, 2017 at 10:19am

आदरणीय गिरिराज जी,
उम्दा ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.
सादर

Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 5:45pm
वाह वाह आदरणीय गिरिराज भाई बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है। दिल से बधाई स्वीकार करें।सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 3:31pm

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब

कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

तख़्त की सीढ़ियाँ नई हैं अब

कोई कह दे उन्हें, सँभल जायें

आदरणीय गिरिराज भाई साब इस ग़ज़ल के इन शेरो ने तो मन मोह लिया ..बहुत ही शानदार रचना पर आपको हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Afroz 'sahr' on September 14, 2017 at 4:08pm
आदरणीय गिरीराज भंडारी जी सुंदर रचना है!बधाई स्वीकार करें!
Comment by Ravindra Pandey on September 9, 2017 at 2:58pm

वाह... शानदार..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 30, 2017 at 9:21am

आदरनीय अजय भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by ajay sharma on August 28, 2017 at 11:52pm

great sir ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 28, 2017 at 9:43pm

आदरनीय राम अवध भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 28, 2017 at 9:42pm

आदरनीय लक्ष्मण भाई , गज़ल की सराहना के लिये आभार आपका ।

कृपया ध्यान दे...

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