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बस यूँ ही दशरथ माँझी... / किशोर करीब

बस यूँ ही दशरथ माँझी...

माझी नहीं बस नाव को जो खींच ले मँझधार से
‘माँझी’ तो है जो रास्ता ले चीर नग के पार से।
प्रेम था वो दिव्यतम जिसमें भरी थी जीवनी
वो फगुनिया थी मरी पर दे गई संजीवनी।
एक कोशिश ला मिलाती गंग को मैदान से
एक कोशिश रास्ता लेती विकट चट्टान से।
ले हथौड़ी और छेनी पिल पड़ा वो वीर था
हो गया भूशाई जो दुर्दम्य पर्वत पीर था।
ताज और विक्टोरिया से है हमारा वास्ता,
पर नमन के योग्य है गहलौर का वो रास्ता!!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 17, 2017 at 12:20pm
नमस्कार आदरणीय Mohammad Arif साहब और श्री Lakshman Dhami साहब, प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभारी हूँ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2017 at 11:50am
अच्छी कविता हार्दिक बधाई...
Comment by Mohammed Arif on August 17, 2017 at 7:38am
आदरणीय श्याम किशोर जी आदाब, दशरथ माझी के साहस और धैर्य को समर्पित बेहतरीन रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 16, 2017 at 6:13pm
प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 16, 2017 at 3:35pm

अच्छी कविता | हार्दिक बधाई आदरणीय |

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