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प्रकाश को काटते नभोचुम्बी पहाड़

अब हुआ अब हुआ अँधेरा-आसमान ...

अनउगा दिन हो यहाँ, या हो अनहुई रात

किसी भी समय स्नेह की आत्मा की दरगाह

दीवारों के सुराख़ों में से बुलाती है मुझको

और मैं आदतन चला आता हूँ तत्पर यहाँ

पर आते ही आमने-सामने सुनता हूँ आवाज़ें

इस नए निज-सर्जित अकल्पनीय एकान्त में

अनबूझी नई वास्तविकताओं के फ़लसफ़ों में

और ऐसे में अपना ही सामना नहीं कर पाता

झट किसी दु:स्वप्न से जागी, भागती, हाँफती

लौट आती है भीषण वेदना पूछने दु:खांत प्रश्न

प्रकाश को काटते  गूंगे अवाक खड़े  पहाड़ से

भीतर फिर से फैल रहे  तनाव के आसमान से 

प्रलय...

चुप है नभोचुम्बी पहाड़

चुप है गंभीर अँधेरा-आसमान

           ----------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on August 21, 2017 at 5:16am
आद0 विजय निकोर जी उम्दा सृजन, भाव पक्ष बेहद मजबूत, मेरी बधाइयाँ आपको।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2017 at 8:54pm
आ. भाई विजय जी सुंदर रचना हुई है । नभोचुम्बी शब्द गढ़ने के लिए अतिरिक्त बधाई ।
Comment by Mohammed Arif on August 20, 2017 at 5:42pm
अनुउगा दिन हो, या हो अनहुई रात
किसी भी समय स्नेह की आत्मा की दरगाह
दीवारों के सुराख़ों में से बुलाती है मुझको
और मैं आदतन चला आता हूँ तत्पर यहाँ वाह!वाह!! क्या सुंदर अभिव्यक्ति है ।बहुत ही सुंदर चित्रण ।
हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोर जी ।

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