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जब से तूने ..


जब से तूने
मुझे
अपनी दुआओं में
शामिल कर लिया
मैं किसी
खुदा के घर नहीं गया


जब् से तूने
अपने लबों पे
मेरा नाम
रख लिया
मैं
तिश्नगी भूल गया


जब से तूने
मेरी आँखों को
अपने अक्स से
सँवारा हे'
मेरे लबों ने
हर लम्हा
तुझे पुकारा है


जब से तूने
निगाह फेरी है
लम्स-ए-मर्ग का
अहसास होता है
वो शख़्स
जो तुझमें कहीं
सोता था
आज
दहलीज़े दीद को
भिगोता है


(लम्स-ए-मर्ग=मृत्यु का अहसास )


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 3, 2017 at 12:56pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी भाई साहिब प्रणाम , सृजन को अपने मधुर शब्दों से अलंकृत करने का दिल से आभार। आ. समर कबीर जी का सुझाव सदा मेरा पथ प्रदर्शित करता है। आपका और उनका मैं तहे दिल से आभारी हूँ। सृजन को पुनः प्रेषित कर रहा हूँ।

Comment by Sushil Sarna on September 3, 2017 at 12:56pm


आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब , सृजन के भावों की गहनता को आत्मीय मान देने का दिल से शुक्रिया। आपका इशारा मैं समझ गया हूँ और तदनुसार संशोधन कर रहा हूँ। आपकी ये छोटी छोटी बातें मेरे सृजन में नक्काशी का काम करती हैं। तहे दिल से शुक्रिया सर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2017 at 6:29pm

आदरनीय सुशील भाई , सुन्दर भाव अपूर्ण कविता के लिये बधाई आपको । आ. समर भाई जी की सलाह पर गौर कीजियेगा ।

Comment by Samar kabeer on September 1, 2017 at 9:43pm
जनाब सुशील सरना साहिब आदाब,बहुत उम्दा कविता है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'जब से तूने
मेरी दीद् को
अपनी अक्स से
सँवारा है'
'मेरी दीद् को'"दीद्"का अर्थ है देखना,'अक्स'पुल्लिंग है, आपकी पंक्तियां यूँ होना चाहिए :-
'जब से तूने
मेरी आँखों को
अपने अक्स से
सँवारा हे'
Comment by Sushil Sarna on August 31, 2017 at 5:03pm

आदरणीय फूल सिंह जी सृजन की आत्मीय सराहना का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on August 31, 2017 at 5:03pm


आदरणीया कल्पना भट्ट जी सृजन के भावों की आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by PHOOL SINGH on August 31, 2017 at 4:03pm

बेहतरीन

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 30, 2017 at 5:08pm

वाह बेहतरीन एहसास | हार्दिक बधाई आदरणीय |

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