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धब्बा लगा रहा है कोई आफ़ताब में

221 2121 1221 212

आ जाइये हुजूर जरा फिर हिजाब में ।
लगती बुरी नजर है यहां माहताब में ।।

बच्चों की लाश पर है तमाशा जनाब का ।
औलाद खो रहे किसी खानाखराब में ।।

अंदाज आपके हैं बदलते अना के साथ ।
शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में ।।

सत्ता मिली जो आपको चलने लगे हैं दौर ।
डूबे मिले हैं आप भी महंगी शराब में ।।

खामोशियों के बीच जफा फिर जवाँ हुई ।
आंखों ने अर्ज कर दिया लुब्बे लुआब में ।।

यूँ ही किया था जुर्म वो दौलत के नाम पर ।
दो गज जमीं हुई है मयस्सर हिसाब में ।।

पूछा वतन का हाल मियां खत को भेजकर।
आया न कोई खतभी अभी तक जबाब में।।

अफसर बिके हैं खूब यहां आंख बन्द है ।
धब्बा लगा रहा है कोई आफ़ताब में ।।

सारा यकीन ढह गया हालात देखकर ।
मिलने लगे हैं जुर्म भी अपने शबाब में ।।

रहबर तेरा गुनाह भी दुनियां को है पता ।
छुपता है देर तक नहीं चेहरा नकाब में ।।

उतरा है रंग आपका तीखे लगे सवाल ।
हड्डी मिली है आपको जब से कबाब में ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 11:45pm
आ0 डॉ आशुतोष जी शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 11:42pm
आ0सालिम रजा रेवा साहब शुक्रिया
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 6, 2017 at 11:31pm
Sunder prastiti naveen ji
Comment by SALIM RAZA REWA on September 6, 2017 at 9:00pm
आ. नवीन जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 6:46am
आ0 गजेंद्र श्रोत्रिय साहब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 6:45am
आ0 महेंद्र कुमार साहब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 6:44am
आ0 ब्रिज कुमार ब्रज साहब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 6:43am
आ0 विजय निकोरे साहब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 6, 2017 at 6:42am
आ0 तस्दीक़ अहमद साहब शुक्रिया
Comment by vijay nikore on September 6, 2017 at 1:31am

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

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