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तुम ही बताओ न ...

क्या हुआ
हासिल
फासलों से
आ के ज़रा
तुम ही बताओ न

इक लम्हा
इक उम्र को
जीता है
ख़ामोशियों के
सैलाब पीता है
उल्फ़त के दामन पे
हिज़्र की स्याही से
ये कैसी तन्हाई
लिख डाली
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न

ये किन
आरज़ूओं के अब्र हैं
जो रफ्ता रफ़्ता
पिघल रहे हैं
एक लावे की तरह
चश्मे साहिल से

क्यूँ हर शब्
तेरी मख़मूर नज़रें
मेरे तन्हा लम्हों में
मुख़ातिब होती हैं
मुझसे

क्यूँ तेरे बदन की
आबनूसी महक
मुझे
बैचैन किये रहती है

क्यूँ मेरे ख्यालों के
जिस्म पर
तुम्हारे अनबोले लम्स
आज भी
रक़्स करते हैं

मेरे अश्कों की लकीरों में
तैरते सवालों को
अंजाम दे जाओ


तिश्नागर लबों को
अपने लबों से
ग़ुम हुई पहचान
दे जाओ


ले गयी थी
जो मुझसे छीन के
सूखे ही सही
वही गुल
वही अरमान दे जाओ


कब तलक ठहरूं
गैरों के शानों पर
फ़ना होने से पहले
आ के
ज़रा
तुम ही बताओ न


मेरे चेहरे को
उड़ते कफ़न से

आ के 
ज़रा
ढक जाओ न

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 15, 2017 at 2:06pm

आदरणीय राज़ नवादवी  साहिब सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार। आउट आफ स्टेशन होने के कारण प्रत्युत्तर देने में विलम्ब हुआ , क्षमा चाहता हूँ। थैंक्स 

Comment by राज़ नवादवी on September 7, 2017 at 8:13pm

आदरणीय  Sushil Sarna जी, बहुत सुन्दर चित्रण किया है आपने प्रेम की विवशता का. बधाई स्वीकार करें. 

Comment by Sushil Sarna on September 7, 2017 at 7:58pm

आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 7, 2017 at 7:58pm

आदरणीय मो. आरिफ़ साहिब, आदाब। .. सृजन पर आपकी मन मुदित करती प्रशंसा का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 7, 2017 at 7:58pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , प्रस्तुति आपकी आत्मीय स्नेह बरखा की आभारी है। हार्दिक आभार।

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on September 7, 2017 at 4:42pm

achehe rachnaa mtirawar

Comment by Mohammed Arif on September 7, 2017 at 7:43am
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Samar kabeer on September 6, 2017 at 5:52pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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