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रकीबों को उठाया जा रहा है ।
किसी पर जुल्म ढाया जा रहा है ।।

मैं छोड़आया तुम्हारी सल्तनत को।
मगर चर्चा चलाया जा रहा है ।।

मुखौटे में मिले हैं यार सारे ।
नया चेहरा दिखाया जा रहा है।।

सुखनवर की किसी गंगा में देखा ।
नया सिक्का चलाया जा रहा है ।।

सही क्या है गलत क्या है ग़ज़ल में ।
नया कुछ इल्म लाया जा रहा है ।।

अदब से वास्ता जिसका नहीं था ।
उसे आलिम बताया जा रहा है ।।

सिकेंगी रोटियां अब खूब साहब ।
हमारा दिल जलाया जा रहा है ।।

--नावीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 7:24pm
आ0 ब्रजेश कुमार ब्रज जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 7:23pm
आ0 कल्पना भट्ट रौनक जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 7:22pm
आ0 गिरिराज भंडारी सर सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 23, 2017 at 7:22pm
आ0 कबीर सर सादर आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 16, 2017 at 3:16pm
खूबसूरत ग़ज़ल हार्दिक बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 10:53am

आदर्णीय नवीन भाई ,अच्छी गज़ल कही है. गज़ल के लिये आपको बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on September 14, 2017 at 5:56pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'जुर्म'को "ज़ुल्म'कर लीजिये, जुर्म किया जाता है,और ज़ुल्म किया भी जाता है और ढाया भी जाता है,यहाँ "ज़ुल्म"ही मुनासिब होगा ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 14, 2017 at 4:13pm

वाह , बहुत खुबसूरत ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय , हार्दिक बधाई आपको |

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 13, 2017 at 9:37pm
भाई अफरोज साहब इसे अविलम्ब ठीक करता हूँ
Comment by Afroz 'sahr' on September 13, 2017 at 9:32pm
आदरणीय नवीन जी अच्छी ग़जल की आपको बधाई देता हूँ ""तोहमत"" (स्त्रीलिंग) अर्थात मुअन्नस है! आपने कहा है! ""नया तोहमत लगाया जा रहा है""

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