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हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है ;अलका 'कृष्णांशी'

समीक्षार्थ.........छंद-- तांटक  (एक प्रयास)

*******

हिन्दी का घटता रुझान पर , भाषा में गहराई है
हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.

नव पीढ़ी ने हिंदी में अब, लिखना पढ़ना छोड़ा है
परिवर्तन ऐसा आया दिल ,अंग्रेजी से जोड़ा है
निज भाषा का परचम लहराने का करते हैं दावा
मंचों से ही है चिंतन अंग्रेजी पर बोलें धावा

.
अंग्रेजी स्टेटस सिंबल है, हिंदी दिखती काई है
हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.
साहित्य दर्पण समाज का फिर भी इसे उखाड़ा है
हिंदी दिवस मनाकर के बस पल्ला सबने झाड़ा है
ब्रांड बनाते हैं अपना फिर, चकाचोंध में गाते है
अंतहीन शोहरत की भूख, का दमखम दिखलाते है 
.

गौरवशाली साहित्य पर पेंशन की परछाई है

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.

कालखंड की भाषा शैली , अवधि औ ब्रज की बोली
खड़ी बोली और मैथिलि ने ,कानों में मिसरी घोली
शब्दशास्र की बूढी डंडी से गर सबको हांकेंगे
रचनाकार बदल के रस्ता अंग्रेजी में झांकेंगे
.

दीप प्रज्वलन माल्या अर्पण, परिचर्चा की खाई है

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

.

कुदरत का बदलाव नियम है ,क्लिष्ट न होने दो भाषा
पाठकगण के मन भी जागे,सरल सहज की अभिलाषा
सन्नाटों को गुंजित कर दे,शंखनाद रचनाओं का
हरसिंगार हिंदी का हो ज्यूँ ,सन्निपात उल्काओं का
.

मातृभाषा ये अपनी है अपनों की बड़ी सताई है

हिंदी क्यूँ ऐसे लगती ज्यूँ वृदाश्रम की माई है

*******

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on October 1, 2017 at 12:50pm

आदरणीय नन्दकिशोर दुबे जी ,बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई।  आभार।  सादर ।

Comment by नन्दकिशोर दुबे on September 24, 2017 at 2:27pm
वास्तव में बहुत सुन्दर व् यथार्थपरके रचना ।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:26pm

आदरणीय  Samar kabeer जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई,  आभार  सादर ।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:25pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई,  आभार  सादर ।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:24pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई।  आभार।  सादर ।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:23pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई , अंग्रेजी वाले  शब्दों में मुझे भी लगा पर कुछ और सूझ नहीं रहा , फिर भी कोशिश करती हूँ. . मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।  सादर ।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:21pm

आदरणीय   शिज्जु "शकूर"  जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई , आभार सादर ।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:20pm

आदरणीय  पंकजोम " प्रेम "  जी बहुत धन्यवाद कि आपको मेरी रचना पसंद आई , आभार सादर ।

Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 11:20pm
मोहतरमा अलका जी आदाब,अच्छा गीत हुआ,बधाई ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 17, 2017 at 11:39am
बहुत सुन्दर सरस और सारगर्भित रचना हुई आदरणीया..हार्दिक बधाई

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