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ग़ज़ल - मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  
नहीं ये ठीक, मैं तन्हा उदास बैठा था

मैं उसकी ताब से खो कर हवास बैठा था

                                                                                    

नज़र उठा के तेरी सिम्त कैसे करता मैं

नज़र से चल के कोई दिल के पास बैठा था

 

कहीं नदी की रवानी थमी थी पत्थर से

कहीं लिये कोई सदियों की प्यास बैठा था

 

है मोजिज़ा कि ख़ुदा का करम बहा मुझ पर   

वो तर बतर हुआ जो मेरे पास बैठा था

 

जलीं वहीं पे दुकानें बहुत सी कपड़ों की

जहाँ सड़क पे कोई बे लिबास बैठा था

 

उधर से गोलियाँ चलतीं, इधर से पत्थर थे

खबर ये देख के, मैं बद हवास बैठा था

 

डरी हुयी थी हक़ीक़त, वो बोलती कैसे

टिकाये अस्लहे सर पर, क़यास बैठा था     

************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 1067

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 5:50pm

आदरनीय मोहित भाई , आपका हृदय से अभार , सराहना के लिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 5:50pm

आदरणीय अफरोज़ भाई , गज़ल पर उपस्थिति और सला के लिये आभार ।
टिकाये - टिकाए से सहमत हूँ , आवश्यक सुधार कर लूँगा , दूसरी सलाह विचारणीय है .. सोच रहा हूँ , आपका पुनः आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 5:46pm

आदरणीय सलीम भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 5:45pm

आ. श्याम नाराइन भाई , गज़ल की सराहना के लिये आभार आपका


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 16, 2017 at 1:56pm

आ. गिरिराज जी ग़ज़ल पर आए सुझाव काबिल ए गौर है

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 1:54pm

बधाई आ. गिरिराज जी.
अफरोज़ साहब से सहमत हूँ 
सादर 

Comment by Afroz 'sahr' on September 16, 2017 at 11:51am
आदरणीय गिरीराज जी सुंदर ग़ज़ल के लिये बधाई!आपने कहा है ""ख़ुदा का करम बहा मुझ पर"" ख़ुदा का करम बहता नहीं है बल्कि "होताहै" ग़जल के अंतिम शेर के सानी मिसरे में शब्द "टिकाये" नहीं बल्कि "टिकाए"ठीक होगा
Comment by SALIM RAZA REWA on September 16, 2017 at 11:09am
आ. गिरिराज जी ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई,
Comment by Shyam Narain Verma on September 16, 2017 at 10:11am

इस खूबसूरत रचना के लिये दिली दाद कुबूल करें

सादर

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