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जिसे ख़यालों में रखता हूँ - सलीम रज़ा रीवा


1212 1122 1212 22

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जिसे ख़यालों में रखता हूँ शायरी की तरह.
मुझे वो जान से प्यारा है जिंदगी की तरह.
.
क़सम जो खाता था उल्फ़त में जीने मरने की.
वो सामने  से गुज़रता है अजनबी की तरह.
.
यूँ ही न बज़्म  से  तारीकियाँ  हुईं रुख़सत.
कोई न कोई तो आया है रोशनी की तरह.
.
खड़े हैं छत पे  हटा कर निक़ाब वो रुख़ से.
अंधेरी शब भी यूँ रोशन है चांदनी की तरह.
.
अगर  बिखर  गए  अपना  वुजूद  खो  देंगे.
जुड़े रहें यूँ ही फूलों की इक लड़ी की तरह.
.
तेरे  ही  प्यार की  ख़ुशबू  है मेरी साँसों में.
मेरी हयात में शामिल है तू ख़ुशी की तरह.
.
ये  मांगता  है "रज़ा" हर  घड़ी दुआ रब से.
कभी  तो जी लूँ ज़रा देर आदमी कि तरह.

.......................................

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 18, 2017 at 11:01am

मोहतरम सलीम रज़ा साहब बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, बहुत-बहुत बधाई आपको,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 18, 2017 at 10:50am

आ. सलीम भाई , खूब सूरत गज़ल कही है , शे र दर शेर मुबरकबाद कुबूल कीजिये ।

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