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भले ही आईने धोये हुए हैं (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२

चढ़े सूरज तलक सोए हुए हैं

किसी की याद में खोए हुए हैं

 

ग़ज़ल लिक्खी हुई है आंसुओं से

कहें किससे कि हम रोये हुए हैं

 

तभी भीगा हुआ तकिया मिला है

इसे अश्कों से हम धोये  हुए हैं

 

कमर टूटी ज़फ़ा की चोट खाकर 

मगर फिर भी वफ़ा ढोए हुए हैं

 

वहाँ चर्चा हमारा हो रहा है

न जाने हम कहाँ खोए हुए हैं

 

तुम्हारे दाग ज्यों के त्यों दिखेंगे

भले ही  आईने धोए हुए हैं  

चुभेंगे तुमको  भी इक दिन ये  कांटें

मेरी राहों में जो बोये हुए हैं  

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 25, 2017 at 12:12pm

आद० डॉ० आशुतोष जी ,ग़ज़ल पर शिरकत और सुखन  नवाजी का दिल से शुक्रिया  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 23, 2017 at 3:51pm

म्हारे दाग ज्यों के त्यों दिखेंगे

भले ही  आईने धोए हुए हैं  

कमर टूटी ज़फ़ा की चोट खाकर 

मगर फिर भी वफ़ा ढोए हुए हैं

 आदरणीया राजेश जी इस उम्दा ग़ज़ल के इन शेरो के लिए बिशेष रूप से बधाई स्वीकार करें सदर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 23, 2017 at 3:07pm

आद० नन्द किशोर दुबे जी  आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 23, 2017 at 3:07pm

आद० बसंत कुमार जी आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 23, 2017 at 3:06pm

आद० सुशील सरना जी आपको  ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ इस सुखन नवाजी का बेहद शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 23, 2017 at 3:05pm

आद० सलीम साहब आपको  ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 23, 2017 at 3:05pm

आद० शिज्जू भैय्या आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ 

Comment by नन्दकिशोर दुबे on September 23, 2017 at 8:01am
बहुत सुन्दर रचना । एक-एक द्विपदी अद्भत अनुभूत हुई ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 22, 2017 at 9:45pm

वाह लाजबाब अशआर

Comment by Sushil Sarna on September 21, 2017 at 8:09pm

चढ़े सूरज तलक सोए हुए हैं
किसी की याद में खोए हुए हैं

ग़ज़ल लिक्खी हुई है आंसुओं से
कहें किससे कि हम रोये हुए हैं

वल्लाह गज़ब के अशआर कहे हैं आपने आदरणीया राजेश कुमारी जी। इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें।

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