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२२ २२ २२ २२ २२ २२  

दिल की बातें वो भी समझें ये  सोचा था 

होंगी मिलकर सारी बातें ये  सोचा था ?

चले जायेंगे अपने रस्ते वो भी इक दिन 

रह जाएंगी तन्हा रातें ये   सोचा था ?

जीवन जैसा होगा उसको जी लेना है 

दर्दो अलम की ले सौगातें ये सोचा था ?

एक बहाना मुझको जीने का मिल जाता 

रह जातीं बस उनकी यादें ये सोचा था ?

डूब गयीं हूँ प्यार में जिनके मैं " रौनक" जी 

इक दिन मुझको वो भूलेंगे ये सोचा था ? 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 1, 2017 at 4:32pm
आदरणीया कल्पनाजी बढ़िया ग़ज़ल हुयी है बधाई स्वीकारें सादर
Comment by Samar kabeer on October 1, 2017 at 3:18pm
जनाब अफ़रोज़ साहिब आदाब,
चले जा/'जा'में मात्रा पतन फेलुन
एंगे/फेलुन
अपने/फेलुन
रस्ते/फेलुन
वो भी/फेलुन
इक दिन/फेलुन
---
दर्द-ओ-/फेलुन
अलम की/फेलुन,मात्रा पतन ।
ले सौ/फेलुन
ग़ातें/फेलुन
ये सो/फेलुन
चा था/फेलुन
ठीक तो है भाई ?
Comment by Afroz 'sahr' on October 1, 2017 at 2:57pm
आदरणीय कल्पना रौनक़ जी अच्छी ग़ज़ल के लिए बहुत बधाई आपको ।दूसरे शेर का उला मिसरा और तीसरे शेर का सानी मिसरा अर्कान के मुताबिक तक़्तीअ पर खरा उतरता दिखाई नहीँ पड़ता है। बाकी गुणीजन अपनी राय देंगे।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on October 1, 2017 at 1:35pm

आदरणीया  KALPANA BHATT ('रौनक़') जी  , बहुत सुंदर  ग़ज़ल ,हार्दिक बधाई ।  सादर.

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 28, 2017 at 6:06pm
मुहतर्मा कल्पना रौनक़ साहिबा ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें ।
Comment by Mahendra Kumar on September 27, 2017 at 7:49pm

आ. कल्पना मैम, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 27, 2017 at 6:38pm

धन्यवाद् आदरणीय रामबली गुप्ता जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 27, 2017 at 6:37pm

धन्यवाद आदरणीय बृजेश कुमार जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 27, 2017 at 6:36pm

सादर धन्यवाद् आदरणीय तेज वीर सिंह जी | 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 27, 2017 at 6:35pm

धन्यवाद आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब |

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