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ख़्यालों में गिरफ़्तार

गम्भीर   उदास

अपना सिर टेक कर

इ-त-नी पास

तुम इतनी पास

तो कभी नहीं बैठती थी

फिर आज...?

मिलने पर 

न स्वागत

न शिकायत

न कोई बात

अपने में ही सोचती-सी ठहरी

धड़कन की खलबली में भी

तुम इतनी आत्मीय ...

मेरे बालों की अव्यवस्था को ठेलती

कभी शाम के मौन में  शाम की

निस्तब्धता को पढ़ती

शांत पलकें, अब अलंकार-सी

जागती-सी सोचती, कुछ खोजती

पूछती हैं कोई शरारत भरा सवाल

मेरी आँखों से मेरी आँखों में, ..बस

कभी मुंदती, कभी खुलती पलकें तुम्हारी

शिशु-सी मुस्कान, कि मानो ईश्वर हो पास

आसमान भी अब बिना सरहद का लगता

हम दोनों पर इ-त-ना महरबान ... सुनो

कहता है एक बात, एक बात कहता है

स्नेह की महक में विकसित फूलों-सी तुम

आज यूँ ही मेरी धड़कन पर सिर टेके रहो

                  ----------

-- विजय निकोर

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Comment

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Comment by vijay nikore on November 1, 2017 at 4:44pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय महेन्द्र कुमार जी।

देर से आया हूँ, क्षमाप्रार्थी हूँ।

Comment by vijay nikore on November 1, 2017 at 4:41pm

// भावनाओ का समुंदर उड़ेल दिया आपने //

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिहं जी।

Comment by vijay nikore on October 8, 2017 at 12:51am

//मन्त्र मुग्ध सा इसे मैं पढता ही चला गया। कि-त-ना का नवीन प्रयोग मुझे बहुत भाया//

आपने मेरे प्रयास को सफ़ल किया है, आदरणीय सुशील जी। हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on October 8, 2017 at 12:49am

//बहुत ख़ूबसूरत अहसासात से सजी//

आपने म्रेरा मनोबल बढ़ाया है। हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय समर जी।

Comment by vijay nikore on October 8, 2017 at 12:47am

//सुंदर अहसासों की पावन बगिया //

इस रचना को इन शब्दों से मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी

Comment by vijay nikore on October 8, 2017 at 12:45am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीया कल्पना जी। 

Comment by Mahendra Kumar on September 27, 2017 at 7:55pm

अच्छी भावपूर्ण कविता है आ. विजय निकोर जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by नाथ सोनांचली on September 26, 2017 at 8:11pm
आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन, भावनाओ का समुंदर उड़ेल दिया आपने, बधाई स्वीकार करें। सादर
Comment by Sushil Sarna on September 26, 2017 at 7:26pm

कभी मुंदती, कभी खुलती पलकें तुम्हारी
शिशु-सी मुस्कान, कि मानो ईश्वर हो पास
आसमान भी अब बिना सरहद का लगता
हम दोनों पर इ-त-ना महरबान ... सुनो
कहता है एक बात, एक बात कहता है
स्नेह की महक में विकसित फूलों-सी तुम
आज यूँ ही मेरी धड़कन पर सिर टेके रहो

वाह आदरणीय मन्त्र मुग्ध सा इसे मैं पढता ही चला गया। कि-त-ना का नवीन प्रयोग मुझे बहुत भाया। इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई सर।

Comment by Samar kabeer on September 26, 2017 at 6:00pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ख़ूबसूरत अहसासात से सजी इस बढ़िया कविता के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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