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उनकी नज़र से पीना कोई मयकशी नहीं - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212
........
नश्शा नहीं सुरूर नहीं बे खुदी नहीं.
उनकी नज़र से पीना कोई मयकशी नहीं.
.
गुलशन में फूल तो है मगर ताज़गी नहीं.
तेरे बग़ैर ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी नहीं.
.
छूके दरिचा लौट गया मौसम-ए- बहार.
लगता  है अब नसीब मे मेरे खुशी नहीं.
.
राहे वफ़ा में ठोकरें खा कर पता चला.
मुझ में कमी है यार में कोई कमी नहीं.
.
माँ तू है मेहरबान तो है  रब भी मेह्रबाँ.
तुमसे जहां में कोई भी शय क़ीमती नहीं.

.

वो चाहे नज़्म हो या "रज़ा" कोई हो ग़ज़ल.
होती है मुझसे उनके बिना शायरी नहीं.

..............
मौलिक एवं अप्रकाशित  

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Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 7:54pm
जनाब तेजवीर साहिब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by TEJ VEER SINGH on October 3, 2017 at 7:50pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा साहब जी।बेहतरीन गज़ल।

माँ तू है मेहरबान तो है  रब भी मेह्रबाँ.
तुमसे जहां में कोई भी शय क़ीमती नहीं.

Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 6:25pm
जनाब राज़ साहिब,
आपके हौसला अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया,
Comment by राज़ नवादवी on October 3, 2017 at 5:47pm

आदरणीय सलीम रज़ासाहब, ग़ज़ल की सुन्दर प्रस्तुति लिए दिली मुबारकबाद. सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 5:10pm
जनाब आरिफ साहब,
आपके हौसला अफजाई के लिए बहुत शुक्रिया,
Comment by Afroz 'sahr' on October 3, 2017 at 4:18pm
जनाब सलीम रज़ा साहब वाह वाहहहहहहहहहहह
Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 4:09pm
आली जनाब समर साहब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया अदा करता हूं,
Comment by Samar kabeer on October 3, 2017 at 2:52pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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