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कविता ---- एक दूजे का साथ ------

इतने साल बीत गये 

ना वो बदली जरा ना मैं !
आज भी उसे नहीं पसंद
मेरा किसी और से बात करना !

मुझे भी आजतक नहीं भाया
उसका किसी को देख मुस्काना !

उसे अच्छा नहीं लगता जब
मेरा ध्यान उससे हट जाना !

मुझे पसंद नहीं आता उसका
मुझे छोड़ टी.वी. तक देखना !
वो कहती है सुनो प्रिय 
मैं सामने हुं तो मुझे ही देखो !

मुझे भाता है उसे चिडाना
दूसरों को देख देख मुस्काना !

उसे पसंद तक नहीं मेरा चश्मा
मेरी आंखों पर हमेशा रहता !

चश्मा लगाकर सामने मत आना
चश्मा देख उसका चिड-चिडाना !

सामने है वो और मोबाईल हाथ 

देखते ही उसका गुस्से से भर जाना ! 

मेरे पास हो तो मेरे साथ भी रहो 

कह कर उसका उदास हो जाना ! 

किसी और की बात क्या करना 

बाकी है अभी एक दूजे को समझना ! 

हमे आज तक नहीं पसंद आया
एक दूजे का किसी और से जुडना !

----------

मौलिक- अप्रकाशित रचना 

जयति जैन (नूतन), रानीपुर झांसी 

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Comment by जयति जैन "नूतन" on October 29, 2017 at 4:16pm

bahut bahut shukriya sabhi gunijano ka

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 24, 2017 at 7:41am
आदरणीया नूतन जी आपने इस कविता में हृदय की गहराईयों को छूने का उम्दा प्रयास की है ,इस बेहतरीन सृजन के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद
Comment by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 9:46pm

मोहतरमा जयति जैन,इस प्रस्तुति पर बधाई 

Comment by Mohammed Arif on October 6, 2017 at 8:30pm
मोहतरमा जयति जैन जी आदाब, कविता का बेहतर प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आपकी यह कविता तो एकदम सपाट बयानी है । बिम्बों और प्रतीकों का तो प्रयोग है ही नहीं । वर्तनीगत कई अशुद्धियाँ भी है ।
Comment by Samar kabeer on October 5, 2017 at 5:31pm
मोहतरमा जयति जैन(नूतन)जी आदाब,पहली बार आपकी रचना पढ़ने का अवसर मिला है ।
बहुत अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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