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अमर ...

प्रश्न 

कभी मृत नहीं होते
उत्तर
सदा अमृत नहीं होते
कामनाएं
दास बना देती हैं
उत्कण्ठाएं
प्यास बढ़ा देती हैं
शशांक
विभावरी का दास है
शलभ
अमर लौ अनुराग है
दृष्टि
दृश्य की प्यासी है
तृषा
मादक मकरंद की दासी है
भाव
निष्पंद श्वास है
अंत
अनंत का विशवास है
स्मृति
कालजयी कल है
अमर
प्रीत का हर पल है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 723

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 6, 2017 at 12:54pm

आदरणीय मो. आरिफ साहिब , आदाब ... प्रस्तुति को अपनी स्नेह बरखा से पोषित करने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 6, 2017 at 12:53pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन आपकी ऊर्जावान प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by Mohammed Arif on October 6, 2017 at 12:03pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदब, बहुत सुंदर भावों की पीठिका रची है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on October 5, 2017 at 10:12pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, क्या कहने,बहुत पसंद आई आपकी ये कविता,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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