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सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है
सवालों का पंछी सताता बहुत है

कभी भूख से बिलबिलाता ये आये
कभी आँख पानी भरी ले के आये

कभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बन
तो आये कभी मेनका खूबरू बन

धड़कन को मेरी थकाता बहुत है
सवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।

कभी युद्ध की खुद वकालत करे ये
अचानक शहीदों की बेवा बने ये

कभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकर
मिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकर

निगाहों को मेरी रुलाता बहुत है
सवालों का पंछी सताता बहुत है।।2।।

कभी कौम के नाम का फ़तवा पढ़ता
कभी तो अवध के लिए ईंट गढ़ता

न मीरा को पूछे न कबिरा को जाने
न रैदास रहिमन न रसखान माने

स्वयं को ये ज्ञाता बताता बहुत है
सवालों का पंछी सताता बहुत है।।3।।

सब कुछ सुनाकर हौले से आकर
कानों में खुद की ज़रूरत बता कर

ज़रा सी पलक जो झपकना भी चाहे
तो फ़िल्मी हेरोइन सा कपड़े उतारे

लालच में मुझको फँसाता बहुत है।
सवालों का पंछी सताता बहुत है।।4।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 17, 2017 at 9:11am
आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत बहुत आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 17, 2017 at 9:10am
आदरणीय बाऊजी आपने सही ध्यान धराया है, सादर प्रणाम
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2017 at 7:20pm
भाई पंकज जी, बेहतरीन गीत हुआ है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।
Comment by Samar kabeer on October 12, 2017 at 5:39pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,बहुत उम्दा गीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
बह्र इसकी ग़ालिबन 122 122 122 122ली है आपने,कुछ मिसरे बह्र में नज़र नहीं आते उन्हें देखियेगा :-
'धड़कन को मेरी थकाता बहुत है'
'सब कुछ सुनाकर हौले से आकर'
'कानों में ख़ुद की ज़रूरत बताकर'
'लालच में मुझको फँसाता बहुत है'

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