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ग़ज़ल - सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं

मुफ्तइलुन मुफाइलुन  //  मुफ्तइलुन मुफाइलुन

2112       1212      //   2112      1212

क्या करें और क्यों करें, करके भी फायदा नहीं

दिल में जो दर्द है तो है, लब पे कोई गिला नहीं 

 

उसके कहे से हो गये, लाखों के घर तबाह पर 

उसने कहा कि उसने तो, कुछ भी कभी कहा नहीं

 

सच तो हमेशा राज था, सच था हमेशा सामने

सच तो सभी के पास था, ढूंढे से पर मिला नहीं 

 

दोनों के दोनों चुप थे पर, गहरे में कोई शोर था

दोनों ने ही सुना मगर, दोनों ने कुछ कहा नहीं

           

जाने खिलेंगे ख्वाब कब, जाने कब आएगी बहार,  

वक्त के आसमान पर, अब भी कोई घटा नहीं

 

जब भी जलाओ तुम दिए, अपनी मुड़ेर पर कभी  

सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं

"मौलिक-अप्रकाशित" 

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Comment by Ajay Tiwari on October 20, 2017 at 7:43am

आदरणीय बासुदेव जी, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 19, 2017 at 9:00pm
वाहहह अजय तिवारी जी इस खूबसूरत ग़ज़ल की दिल से बधाई। बहुत गहरी बातें कही हैं।
Comment by Ajay Tiwari on October 19, 2017 at 6:55pm

आदरणीय समर साहब, आदाब, 

आपके उदार उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद. आपका सुझाव उपयुक्त है. परिवर्तन कर लूँगा.

आपको भी दीपवाली की बधाईयाँ और हार्दिक शुभकामनायें. 

सादर 

Comment by Samar kabeer on October 19, 2017 at 5:33pm
आपको दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।
Comment by Samar kabeer on October 19, 2017 at 5:12pm
जनाब अजय तिवारी जी आदाब,बहुत उम्दा और शगुफ़्ता ग़ज़ल हुई है ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'दुआ'की जगह "गिला"क़ाफ़िया ज़ियादा मुनासिब होगा,आपका क्या ख़याल है ?
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 3:55pm
ज़िन्दगी के आम तज़ुर्बों पर बढ़िया प्रस्तुति के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय अजय तिवारी जी। दीपोत्सव पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
Comment by Ajay Tiwari on October 19, 2017 at 1:35pm

आदरणीय सलीम साहब, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Ajay Tiwari on October 19, 2017 at 1:34pm

आदरणीय अफरोज़ साहब, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by SALIM RAZA REWA on October 19, 2017 at 10:02am
जनाब अजय तिवारी जी.
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद.
Comment by SALIM RAZA REWA on October 19, 2017 at 10:00am
आ अजय तिवारी जी,
ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई.

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