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जैसे चमन को फूल कली ताज़गी मिले - सलीम रज़ा रीवा

-221 2121 1221 212

जैसे चमन को फूल कली ताज़गी मिले-
वैसे ही जिंदगी तुम्हें महकी हुई मिले  
- 
ये है दुआ तुम्हारा मुकद्दर  बुलंद  हो-
तुमको तमाम उम्र ख़ुशी ही ख़ुशी मिले
-
मिलता था जो ख़ुलूस-ओ-महब्बत से हर घड़ी-
मिलता है आज जैसे कोई अजनबी मिले
- 
बैठा हुआ हूँ उनकी गली में ये सोच कर- 
मुझको कभी झलक तो मेरे यार की मिले
-
या रब मेरे सनम का ना चेहरा उदास हो- 
उसको तमाम उम्र ख़ुशी ही ख़ुशी मिले
-
मुझको किसी भी शै कि नहीं आरज़ू मगर- 
ज़ुल्फों की छाँव मुझकॊ सदा आपकी मिले 
-
बू-ए-चमन का लुत्फ़ भला कैसे हो रज़ा -
मुझको मिले जो फूल सभी कागज़ी मिले  
__________
मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 11, 2017 at 5:36pm
आ. तेजवीर सिंह जी,
ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया,
Comment by TEJ VEER SINGH on November 9, 2017 at 11:21am

हार्दिक आभार आदरणीय सलीम राज़ा रेवा जी।बेहतरीन गज़ल।

मिलता था जो ख़ुलूस-ओ-महब्बत से हर घड़ी-
मिलता है आज जैसे कोई अजनबी मिले

Comment by SALIM RAZA REWA on November 8, 2017 at 8:25am
आ. बृजेश जी,
ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on November 8, 2017 at 8:25am
आ. गजेंद्र जी,
ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया.
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 6, 2017 at 9:33pm
बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीय हर एक शेर बेहद उम्दा..सादर
Comment by Gajendra shrotriya on November 6, 2017 at 7:37pm
अच्छी कहन पे अशआर साधने के लिए आपको हार्दिक बधाई आ०सलीम रजा साहब। मुझे लगता है इस रदीफ और काफिये के साथ आप और भी बेहतर अशआर कह सकते हैं।सादर।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 6, 2017 at 4:25pm
आदरणीय योगराज जी,
आपको इस ग़लती से अवगत कराने के लिए दिली शुक्रिया,
मतला सुधार कर लिया जाएगा..

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 6, 2017 at 4:20pm

ताज़गी और ज़िन्दगी में व्यंजन "ग" हर्फ़-ए-रवी है साहिब! अब इसे अंत तक निभाना पड़ेगा.

कृपया ध्यान दे...

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