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1. 

उतारिए चश्मा

पोछिये धूल

चीज़ें खुदबखुद... साफ़ हो जाएँगी ।

 

 

2.

ज़रूरी है… सफाई अभियान

शुरुआत कीजिये

दिल से ....

 

3.

गंदगी सिर्फ मुझमे ही नहीं

तुम में भी है मित्र

ज़रा अंदर तो झाँको ....

 

4.

जब ईमान गिरवी हो

ज़मीर बिक चुका हो

कौन उठायेगा बीड़ा

समाज की सफाई का ....

 

5.

साफ़ नहीं होती गंदगी

बार बार उंगली दिखाने से

कोशिश करनी पड़ती है

मिलकर... ईमानदारी से  

 

6.

आज उतार दिया मैंने

चेहरे का नकाब

अपनी बदसूरत शक्ल

अच्छी लगने लगी....

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2017 at 11:01am

आदरणीय लक्ष्मण साहब हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया ....

Comment by नादिर ख़ान on December 3, 2017 at 11:00am

जनाब समर साहब आपकी अमूल्य टिप्पणियों और सुझाओ का बहुत बहुत शुक्रिया अपनी पारखी नज़र से यूँ ही नवाजते रहिए .......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 29, 2017 at 7:44pm
सुंदर
Comment by Samar kabeer on November 28, 2017 at 2:32pm
जनाब नादिर ख़ान साहिब आदाब,बहुत उम्दा क्षणिकाएं लिखीं आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

पहली क्षणिका में 'उतरिए' को "उतारिये"कर लीजिए ।

आख़री क्षणिका में 'चेहरे का नकली नकाब'
इस पंक्ति को "चहरे का नक़ाब"कर लीजिए,क्योंकि नक़ाब असली नक़ली नहीं होते,चहरे होते हैं,देखियेगा ।
Comment by नादिर ख़ान on November 28, 2017 at 1:25pm

 जनाब शेख शहजाद साहब मूल्यवान टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया .... बस प्रयोग जारी ,है सीखने का काम चल रहा है सादर ...

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 27, 2017 at 8:30pm
सच्ची सफ़ाई और आत्मावलोकन पर बढ़िया क्षणिका-सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब नादिर ख़ान साहिब।
Comment by नादिर ख़ान on November 27, 2017 at 6:26pm

 धन्यवाद आपका आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी 

Comment by नाथ सोनांचली on November 27, 2017 at 6:20pm
आद0 नादिर खान जी सादर अभिवादन, उत्तम क्षणिकाएँ सृजित की आपने,हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर। सादर
Comment by नादिर ख़ान on November 27, 2017 at 11:55am

बहुत शुक्रिया जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब ..... 

Comment by Mohammed Arif on November 26, 2017 at 8:47pm
आदरणीय नादिर खान साहब आदाब,
समसामयिक विषयों पर लिखी गई बेहतरीन क्षणिकाएँ । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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