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तेवर देखे ठंड के , थर-थर काँपे गाँव ।
सभी तलाशे धूप को , सूनी लगती छाँव ।।

यार बढ़े हैं आज तो , ठंडक के वो भाव ।
बस्ती के हर मोड़ पर , सुलगे देख अलाव ।।

बदला मौसम ने ज़रा , देखो अपना रूप ।
कितनी प्यारी लग रही , जाड़े की ये धूप ।।

अदरक वाली चाय से , होती सबकी भोर ।
बच्चों का भी शाम से , थम जाता है शोर ।।

किट-किट करते दाँत हैं , काँप रहे हैं हाथ ।
गर्मी लाने के लिये , गर्म चाय का साथ ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on December 14, 2017 at 7:19pm

आपकी प्रतिक्रिया से मेरा लेखन सफल हो गया । हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by vijay nikore on December 14, 2017 at 3:56pm

आपके दोहे पहली बार पढ़े, बहुत ही आनन्द आया। हार्दिक बधाई, आदरणीय भाई मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on December 14, 2017 at 12:07pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी ।

Comment by Mohammed Arif on December 14, 2017 at 12:06pm

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय अफरोज़ सहर जी । लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 14, 2017 at 10:40am
जनाब आरिफ़ साहिब आपके दोहों ने सर्दी में गर्मी का एहसास करा दिया बहुत बधाई आपको,,,,
Comment by नाथ सोनांचली on December 14, 2017 at 8:39am

आद0 मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन। जाड़े पर बेहतरीन शिल्प बद्ध दोहे, पढ़कर अच्छा लगा। बल भर बधाई प्रेषित है। सादर

Comment by Mohammed Arif on December 14, 2017 at 7:47am

बहुत-ब हुत आभार आदरणीय रामबली गुप्ता जी । लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by रामबली गुप्ता on December 14, 2017 at 3:24am

सभी दोहे सुंदर और शिल्पबद्ध हैं आदरणीय आरिफ़ जी हार्दिक बधाई स्वीकार करें।सादर

Comment by Mohammed Arif on December 12, 2017 at 11:16pm

बहुत -बहुत आभार सोमेश  कुमार जी ।

Comment by Mohammed Arif on December 12, 2017 at 4:27pm

हा ! हा ! हा! हा ! हा !  मज़ा आ गया मुझे आपकी प्रतिक्रिया पाकर । हार्दिक आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी । लेखन सार्थक हो गया ।

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