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प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||  (मुक्तमणि छंद पर आधारित गीत 'राज')

पर्वत जैसे दिन कटें ,रातें लगती भारी|  

 प्रीत रीति के  खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

 

 अधरों पर  मुस्कान है,उर के भीतर ज्वाला|

 पीनी पड़ती सब्र की ,भीतर भीतर हाला||

बिस्तर पर जैसे बिछी,द्वी धारी कुल्हारी|

प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

 

सरहद से आई नहीं, अबतक कोई पाती|  

जल जल आधी हो गई,इन नैनों की बाती||

चौखट पर बैठी रहूँ देखूँ बारी बारी|

प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

 

  शीत लहर में हो गई,तन की डाली रूखी|         

उर के आँगन की लगे , तुलसी सूखी सूखी||

स्वप्न यान से भेज दो,थोड़ी धूप उधारी|   

प्रीत रीति के खेल में,ऐ साजन मैं हारी||

 

भारत माँ के फर्ज़ से, फुर्सत कभी मिले जो|

पवन परों में बांधकर,महक बदन की भेजो||  

तेरी खुशबू से हरी, होगी मन फुलवारी|

प्रीत रीति के खेल में,ऐ साजन मैं हारी||

 -----मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2018 at 10:26pm

आद मोहम्मद आरिफ़ जी ,आपको गीत पसंद आया दिल से आपका बहुत बहुत शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2018 at 10:25pm

आद० तेजवीर सिंह जी ,आपको गीत पसंद आया मेरा लिखना सार्थक हो गया दिल से बहुत बहुत आभार आपका .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 31, 2018 at 10:24pm

आद० रक्षिता जी ,आपको ये गीत पसंद आया आपका दिल से आभार .

Comment by Mohammed Arif on January 30, 2018 at 11:20pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी आदाब,

                            विरह की अग्नि में दग्ध विरहिणी की व्यथा को व्यक्त करता अच्छा गीत । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 30, 2018 at 8:32pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राजेश कुमारी जी।बेहतरीन गीत।

सरहद से आई नहीं, अबतक कोई पाती|  

जल जल आधी हो गई,इन नैनों की बाती||

चौखट पर बैठी रहूँ देखूँ बारी बारी|

प्रीत रीति के खेल में ,ऐ साजन मैं हारी||

Comment by रक्षिता सिंह on January 30, 2018 at 11:42am

आदरणीया राजेश जी,

विरह को प्रस्तुत करती इस खूबसूरत रचना के लिए बहुथ बहुत बधाई।।

कृपया ध्यान दे...

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