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हमने तुम्हारे वास्ते क्या क्या नहीं किया - सलीम रज़ा

221 2121 1221 212 

हमने तुम्हारे वास्ते क्या क्या नहीं किया
अफ़सोस तुमने हमपे भरोसा नहीं किया

oo
आया है जब से नाम तुम्‍हारा ज़बान पर 
होटों ने फिर किसी का भी चर्चा नहीं किया
oo
ज़ुल्मों सितम ज़माने के हंस हंस के सह लिए
लेकिन कभी ईमान का सौदा नहीं किया 
oo
अमनो अमां से हमने गुज़ारी है ज़िंदगी 
मज़हब के नाम पर कभी झगड़ा नहीं किया
oo
उम्मीद उस बशर से करें क्या वफ़ा की हम
जिसने किसी के साथ भी अच्छा नहीं किया
oo
मुझको मिला फ़रेब ‘रज़ा’ इश्क़ में मगर  
मैंने किसी के साथ भी धोका नहीं किया

_________________________

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 953

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 11, 2018 at 9:57pm

बहुत खूब

Comment by amod shrivastav (bindouri) on February 9, 2018 at 6:30pm

खूबसूरत वाहःहः 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 9, 2018 at 6:03pm

इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय सलीम जी..

Comment by SALIM RAZA REWA on February 9, 2018 at 8:34am
सोमेश जी,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया
Comment by somesh kumar on February 8, 2018 at 9:57am

जब से जुड़ा है नाम तेरा मेरे नाम से 

होटों ने फिर किसी का भी चर्चा नहीं किया

बहुत खूब भाई साहब 

Comment by SALIM RAZA REWA on February 7, 2018 at 3:11pm
भाई नादिर साहिब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया...
होंठ ग़लत लफ्ज़ है. सही लफ्ज़ होंट ही है...
Comment by SALIM RAZA REWA on February 7, 2018 at 3:09pm
आदरणीय तेजवीर सिंह जी,
आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत के लिए शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on February 7, 2018 at 3:08pm
जनाब तस्दीक साहिब,
आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत और मशविरे के लिए शुक्रिया.. आपके मशविरे के मुताबिक़ तब्दीली कर दी जाएगी..
Comment by SALIM RAZA REWA on February 7, 2018 at 3:07pm
जनाब आरिफ साहब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया.
Comment by नादिर ख़ान on February 7, 2018 at 12:06pm

जनाब रज़ा साहब गजल की अच्छी कोशिश हुयी है तसदीक साहब ने उचित सुझाओ दिये है होंटो की जगह होठों कर लें .....

कृपया ध्यान दे...

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