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हाँथो में तेरे हमदम जादू नहीं तो क्या है - SALIM RAZA REWA

221 2122 221 2122
हाथों में तेरे हमदम कैसा ये फ़न छुपा है 
मिट्टी को तू ने छूकर सोना बना दिया है
-
उस दिन से जाने कितनी नज़रें लगी हैं मुझपर 
जिस दिन से तूने मुझको अपना बना लिया है
-
यूँ ही रहे सलामत खिलता हुआ ये चेहरा 
तू ख़ुश रहे हमेशा  मेरी यही दुआ है
-
आंखें हैं सुर्ख़  रुख़ पर बिखरे हुए हैं गेसू
हिज्रे सनम में शब भर क्या जागता रहा है
-
इक पल में मुस्कुराना इक पल में रूठ जाना
तेरी इसी अदा ने दीवाना कर दिया है
-
तेरी ख़ुशी में ख़ुश हूँ ग़म में तिरे परेशाँ
तेरा है हाल जो भी वो हाल अब मेरा है 
-
देकर सज़ा-ए-फाँसी ख़्वाहिश वो पूछते हैं
अब क्या उन्हें बताएं क्या आख़िरी रज़ा है
_______________________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 11, 2018 at 6:04am

आद0 सलीम जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन ग़ज़ल, और इस ग़ज़ल के हवाले से चर्चा भी काबिलेतारीफ। आद0 समर साहब से हम सभी सीखते है। बहुत बहुत दाद और मुबारकबाद इस प्रस्तुति पर। सादर

Comment by SALIM RAZA REWA on March 8, 2018 at 10:00pm
आ. बृजेश जी,
ग़ज़ल को अपनी मुहब्बत से नवाज़ने के लिए शुक्रिया,
कहां खो जाते हैं भाई आप ब्लाग़ के सक्रिय सदस्यों में है, आपकी उपस्थिति में मज़ा आता है...
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 8, 2018 at 7:23pm

वाह क्या कहने आदरणीय सलीम जी..बहुतखूब ग़ज़ल कही..

Comment by SALIM RAZA REWA on March 8, 2018 at 5:26pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर',
जी ग़ज़ल पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2018 at 4:12pm

आ. भाई सलीम जी , सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 7, 2018 at 5:59pm
जनाब तस्दीक साहब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया...
यह पाठशाला है और हम तो अभी तालीबे इल्म है...
बाक़ी मेरा मतलब तो समझ ही लिए हैं....
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2018 at 1:36pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। 

गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 7, 2018 at 11:31am
जी हेडिंग बदलना ही भूल गए..
Comment by Samar kabeer on March 7, 2018 at 10:58am

आमीन ।

हेडिंग में भी 'हाँथो' को " हाथों" कर लें ।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 7, 2018 at 10:39am
जनाब समर साहब,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया, कभी कभी experiment हो जाता है, बहरहाल
आपके निगहबानी में, हमेशा सीखने को मिलता है, ख़ुदा आपको अच्छा रखे.

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