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हमने तुम्हारे वास्ते क्या क्या नहीं किया - सलीम रज़ा

221 2121 1221 212 

हमने तुम्हारे वास्ते क्या क्या नहीं किया
अफ़सोस तुमने हमपे भरोसा नहीं किया

oo
आया है जब से नाम तुम्‍हारा ज़बान पर 
होटों ने फिर किसी का भी चर्चा नहीं किया
oo
ज़ुल्मों सितम ज़माने के हंस हंस के सह लिए
लेकिन कभी ईमान का सौदा नहीं किया 
oo
अमनो अमां से हमने गुज़ारी है ज़िंदगी 
मज़हब के नाम पर कभी झगड़ा नहीं किया
oo
उम्मीद उस बशर से करें क्या वफ़ा की हम
जिसने किसी के साथ भी अच्छा नहीं किया
oo
मुझको मिला फ़रेब ‘रज़ा’ इश्क़ में मगर  
मैंने किसी के साथ भी धोका नहीं किया

_________________________

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by TEJ VEER SINGH on February 7, 2018 at 10:36am

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा रेवा साहब जी। बेहतरीन गज़ल।

उससे भला उम्मीद-ए-वफा किस तरह करें

जिसने किसी के साथ भी अच्छा नहीं किया

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 7, 2018 at 9:49am

जनाब सलीम रज़ा साहिब , पिछले कमेंट में आखरी शेर के उला मिसरे में सदा की जगह रज़ा करलें ।"मुझको मिला फ़रेब रज़ा इश्क़ में मगर "।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 7, 2018 at 9:46am

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

शेर2 में ऐब तकाबुले रदीफैंन हो गया ,उला मिसरा यूँ करले --"जब से जुड़ा है नाम मेरा उनके नाम से"  शेर3 के उला मिसरे में लय बिखर रही है और ऐब तनाफुर है(उस से)  ,उसे यूँ करसकते है।  "उम्मीद उस बशर से करें क्या वफ़ा की हम"  शेर5 में ऐब तकाबुले रदीफैंन है ,उला मिसरा यूँ कर सकते हैं " मुझको मिला फ़रेब सदा इश्क़ में मगर" 

Comment by Mohammed Arif on February 7, 2018 at 8:13am

आदरणीय सलीम रज़ा साहब आदाब,

                                जनाब क़मर एजाज़ सुरूर साहब की ज़मीन पर बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र ने क़मर साहब की ग़ज़ल को ताज़ा कर दिया । दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।

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