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ग़ज़ल-नूर की -ईमान छोड दूँ तो क़िरदार मार देगा,

२२१२ १२२ २२१२ १२ २
.
ईमान छोड दूँ तो क़िरदार मार देगा,
इस पार बच गया तो उस पार मार देगा.
.
आदत सी पड़ गयी है अब नफ़रतों की मुझ को
इतना न मुझ को चाहो ये प्यार मार देगा.
.
कितना बचाऊँ लेकिन है तज्रबा... मुकद्दर,
इक रोज़ मेरे सर पर दीवार मार देगा.
.
ये हक़ बयानी का इक औज़ार था मगर अब,
सच बोल दे कलम गर अख़बार मार देगा. 
.
कोचिंग की आशिक़ी में वह मुँह चिढ़ाता शनिचर,
लगता था जैसे हम को इतवार मार देगा.
.  
बोली बढ़ा घटा के बिक जाऊं तो ग़नीमत,
जो बिक न पाए उन को बाज़ार मार देगा.
.
ऐ कामयाबी तेरी मैं राह तक रहा हूँ
इस बार वरना तेरा इन्कार मार देगा.
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 13, 2018 at 1:59pm

शुक्रिया आ सुरेंद्र भाई

Comment by surender insan on March 11, 2018 at 4:40pm

वाह वाह वाह बेहद उम्दा ग़ज़ल की बहुत बहुत बधाई हो आपको। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 11, 2018 at 4:38pm

शुक्रिया आ, लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2018 at 2:42pm

आ. भाई नीलेश जी, इस बोलती गजल के लिए कोटि कोटि बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 11, 2018 at 10:43am

क्या कहने आदरणीय नीलेश जी..बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही है।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 10, 2018 at 8:25am

शुक्रिया आ. तस्दीक़ अहमद जी. मैं किरदार वाले टाइपिंग एरर को ठीक कर लेता हूँ ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 10, 2018 at 8:24am

शुक्रिया आ. सतविंदर सिंह जी 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 9, 2018 at 8:43pm

जनाब नीलेश नूर साहिब , उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।

शब्द "क़िरदार" को किरदार कर लीजियेगा ,शेर5 उला मिसरे की बह्र एक बार चेक कर लें । मतले के हिसाब से बह्र -मफ ऊल-फ़ा इलातुन-म फ ऊल-फ़ा इलातुन  (221-2122-221-2122)है।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 9, 2018 at 8:23pm
आदरणीय नीलेश भाई,गजब के अशआर हैं। हर शेर पर दाद कबूल फरमाएं। कोचिंग वाले पर ख़ास!
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 9, 2018 at 8:04pm

शुक्रिया आ. वर्मा जी 

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