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ग़ज़ल नूर की -. माँ भारती की शान में,

२२१२/२२१२
.
माँ भारती की शान में,
वो रोज़ नव परिधान में.
.
क्यूँ राष्ट्रभक्ति खो गयी
समवेत गर्दभ गान में.
.
सब हो गए कितने पतित
सोचो कथित उत्थान में.
.
हर बैंक कर देंगे सफा
वो स्वच्छता अभियान में.
.
इन्सानियत बाक़ी कहाँ 
अब है बची इन्सान में.  
.
वो माफ़िनामे लिख गये
अपना यकीं बलिदान में.
.
कैसे मसीहा देख लूँ
उस इक निरे नादान में.
.
करते दहन है खूँ फ़िशां
कत्था लगा कर पान में.
.
क्यूँ छल कपट को घर दिया
इस ज़ह’न-ए-आलिशान में.
.
पैग़ाम केवल .. प्रेम है
गीता में औ कुर’आन में.  
.
कुछ भी नहीं है फ़र्क़ “नूर” 
अल्लाह में भगवान में.  
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 15, 2018 at 7:53pm

शुक्रिया आ. सुशिल जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 15, 2018 at 7:53pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 15, 2018 at 7:53pm

शुक्रिया आ. अजय शर्मा जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 15, 2018 at 7:52pm

शुक्रिया आ. सोमेश जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 15, 2018 at 7:52pm

शुक्रिया आ. अजय जी 

Comment by Ajay Kumar Sharma on March 15, 2018 at 2:42pm

वाह !

बहुत सुन्दर रचना...

Comment by Sushil Sarna on March 15, 2018 at 2:36pm

हर बैंक कर देंगे सफा
वो स्वच्छता अभियान में.
.
इन्सानियत बाक़ी कहाँ
अब है बची इन्सान में.

वाह आदरणीय क्या अहसास पिरोये हैं आपने अपनी इस शानदार ग़ज़ल में। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on March 15, 2018 at 12:28pm

जनाब निलेश 'नूर"साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by somesh kumar on March 15, 2018 at 9:24am

bhut khub

Comment by Ajay Tiwari on March 15, 2018 at 8:53am

हर बैंक कर देंगे सफा 
वो स्वच्छता अभियान में.

बहुत खूब!

आदरणीय निलेश जी, इस सामयिक ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई,

कृपया ध्यान दे...

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