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स्वप्निल यथार्थ

स्वप्निल यथार्थ....

जब प्रतीक्षा की राहों में
सांझ उतरे


पलकों के गाँव में
कोई स्वप्न
दस्तक दे


कोई अजनबी गंध
हृदय कंदरा को
सुवासित कर जाए


कोई अंतस में
मेघ सा बरस जाए


उस वक़्त
ऐ सांझ
तुम ठहर जाना
मेरी प्रतीक्षा चुनर के
अवगुंठन के
हर भ्रम को
हर जाना
मेरे स्वप्न को
यथार्थ कर जाना
मेरे स्वप्निल यथार्थ को
अमर कर जाना

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Harash Mahajan on March 15, 2018 at 6:38pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब | एक सशक्त लभाव पक्ष के साथ पेश की है आपने ये कविता ....
"...

कोई अजनबी गंध
हृदय कंदरा को
सुवासित कर जाए"

बहुत ही सुंदर वर्णन |

बधाई सर |

सादर |

Comment by Sushil Sarna on March 15, 2018 at 2:37pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब , आदाब ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Mohammed Arif on March 14, 2018 at 9:01pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,

                              बहुत लाजवाब कविता है । जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है । हर शब्द का चयन सोच समझकर किया गया है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें इस शानदार पेशकश के लिए ।

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