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221 1222 22 221 1222 22

हालात बदलते जाते हैं यह वक्त उसे उलझाता है ।
इंसान हक़ीक़त से अक्सर अब रब्त कहाँ रख पाता है ।।

जो ज़ख्म छुपा कर रखते हैं ईमान बचाकर चलते हैं ।
हिस्से में उन्हीं के ही अक्सर कुदरत का वजीफ़ा आता है ।।

कुछ राज बताने लगतीं हैं माथे की शिकन आंखों की चमक ।
चेहरे से पता चल जाता है जब खाब कोई मुरझाता है ।।

जब लूट गया कोई सपना तब होश में आकर क्या होगा ।
जालिम है अभी कितनी दुनिया यह वक्त हमें समझाता है ।।

उस रात तुम्हारी सांसो का अहसास अभी तक है जिंदा ।
चाहत का समंदर भी अब तक दरिया के लिए लहराता है।।

आबाद मुहब्बत क्या होगी हर मोड़ पे दुश्मन बैठे हैं ।
आशिक को सज़ाकर पलकों में नजरों से गिराया जाता है ।।

जो साथ निभाने वाले थे कुछ रूठ गए कुछ छूट गए ।
अब याद वो लम्हा क्या करना जो दर्द हमे दे जाता है ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 387

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Comment by नाथ सोनांचली on March 27, 2018 at 7:34am

आद0 नवीन जी सादर अभिवादन।तरही मुशायरे की ग़ज़ल यहाँ पोस्ट करना ठीक नहीं। सादर

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 27, 2018 at 12:12am

जी सर हटाता हूँ 

Comment by Samar kabeer on March 26, 2018 at 12:00pm

नवीन जी,जो ग़ज़ल तरही मुशायरे में पोस्ट होती है,उसे ब्लॉग पर दोबारा पोस्ट करना नियम के ख़िलाफ़ है,इसे हटा लें ।

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