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गर्म होती जा रहीं है,

शहर में पागल हवाएँ.

क्या पता इन बस्तियों में,

कब पटाखे फूट जाएँ.

 

ढूँढता अस्तित्व अपना,

सच बहुत बेचैन है.

डस रहा है दिन उसे तो,

काटती अब रैन है.

 

डस्टबिन में जा चुकी हैं,

बुद्ध की जातक कथाएँ.

मात्र कहने के लिए है,

चेहरों पर मुस्कुराहट.

दूर से करते नमस्ते,

द्वार पर दिल के न आहट.

 

मंदिरों में भीड़ तो है,

हैं नहीं आराधनाएँ.

 

हर चुनावी साल में बस,

वायदों की बीन बजती.

रोटियों की कशमकश में,

जिन्दगी यूँ ही गुजरती.

 

पंख खुलने ही न देतीं,

ढेर सारी वर्जनाएँ.

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 9, 2018 at 5:40pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी आपका ह्रदय 

से आभार 

Comment by नाथ सोनांचली on April 9, 2018 at 4:56am

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। वर्तमान हालात पर बेहतरीन गीत सृजन के लिए बधाई देता हूँ। सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 5, 2018 at 9:38pm

आदरणीय बासुदेव अग्रवाल जी आपका ह्रदय से आभार सुझाव के लिए 

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 5, 2018 at 4:59pm

आ0 बसन्त कुमार जी अच्छी व्यंग रचना।

एक सुझाव

'हर चुनावी साल में बस

बीन वादों की है बजती

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 5, 2018 at 4:53pm

आदरणीय Samar kabeer जी का आभार 

Comment by Samar kabeer on April 5, 2018 at 3:21pm

ठीक है भाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 5, 2018 at 1:02pm

आदरणीय  Samar kabeer  जी,  हर चुनावी साल में अच्छे दिनों की बीन बजती , ठीक रहेगा क्या, देखिये 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 5, 2018 at 12:59pm

आदरणीय  Samar kabeer  जी आपके सुझाव का तहे दिल से शुक्रिया, सोचता हूँ क्या हो सकता है इसमें.

Comment by Samar kabeer on April 5, 2018 at 11:09am

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,आज के हालात पर बहुत उम्दा रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

चौथे बन्द की दूसरी पंक्ति में 'वायदों' ग़लत शब्द है सही शब्द है "वादों'" देखियेगा ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 5, 2018 at 9:44am

आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी, आदरणीय Harash Mahajan जी आपका ह्रदय से आभार 

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