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तज़ुर्बे (लघुकथा)

"लगता है कि अभी भी यह उड़ना नहीं सीख पायी।"


"अरे नहीं! दरअसल वह  उड़ना भूल चुकी है बुरे तज़ुर्बों से !" - नई सदी की हैरान, परेशान नवयौवना को घर की छत पर अनिर्णय की स्थिति में देख उसके इर्द-गिर्द हवा में उड़ते एक गिद्ध ने अपने साथी कौवे से कहा। कौवा उस गिद्ध को घूरने सा लगा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2018 at 2:56am

मेरे प्रयास के अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय विजय निकोरे साहिब और आदरणी‌य सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप साहिब

Comment by vijay nikore on April 11, 2018 at 11:39am

कम शब्दों में इतनी कटाक्षपूर्ण लघु कथा, वाह ! आनन्द आ गया पढ़ कर। आपको हार्दिक बधाई, आदरणीय शैख शहज़ाद उस्मानी जी

Comment by नाथ सोनांचली on April 11, 2018 at 5:13am

आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन। बढिया व्यंग्यात्मक लघुकथा। गिद्ध कौवे के माध्यम से आपने ऐसी बातें कह दी कि इस लघुकथा को पढ़कर जेहन से इस बात को उतारना मुश्किल। वाकई बेहतरीन। बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं आपको आगे की लघुकथाओं के लिए। सादर

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 11, 2018 at 4:22am

बहुत ही प्रोत्साहक टिप्पणी के साथ इस रचना को मान दे कर लेखक की‌ हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया नीता कसार जी और आदरणीय महेंद्र कुमार जी।

Comment by Nita Kasar on April 9, 2018 at 6:19pm

बुरे  तजुर्बे ही अच्छे तजुर्बे की राह खोलते है बस हौंसलाअफजाई होना चाहिये कथा के लिये बधाई आद० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Mahendra Kumar on April 9, 2018 at 3:14pm

कम शब्दों में शानदार लघुकथा कही है आपने आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी। प्रतीकों का उम्दा प्रयोग करते हुए बढ़िया व्यंग्य किया है आपने। ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए। सादर। 

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 2:48pm

जज़ाकल्लाह !

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 9, 2018 at 2:33pm

"मुहब्बत की नहीं जाती हो जाती है!" ऐसा ही है साहित्य सृजन और साहित्यकारों के साथ!

Comment by Samar kabeer on April 9, 2018 at 2:29pm

"साहिर" की पंक्ति याद आ गई :-

"मुझको इतनी महब्बत न दो दोस्तो

मैं तो कुछ भी नहीं"

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 9, 2018 at 2:24pm

शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब। डिक्शनरी ख़रीद ही लूंगा। वैसे आप ही काफी हैं इस सम्मानित मंच पर!

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