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ग़ुस्ताख़ी मुआफ़ (लघुकथा)

मिर्ज़ा मासाब कई बार मांसाहार छोड़ने की नाक़ामयाब कोशिशें कर चुके थे।‌ लेकिन उनके घर में बेगम साहिबा के रिवाज़ के मुताबिक़ हर छोटी-बड़ी ख़ुशी के मौक़े पर या तो चिकन पकता या मछली। कभी छोटे या बड़े की जुगाड़ होती या बाज़ार के कबाबों की! मिर्ज़ा जी के शाकाहारी बनने के ख़्वाब इस बार भी चकनाचूर हो गये। रात के ख़ाने के वक़्त दस्तरख़्वान पर बकरे का लज़ीज़ गोश्त पहले से कोई बातचीत किये बिना ही पेश कर दिया गया।‌ उन्होंने बुरा सा मुंह बनाते हुए बेगम की तरफ़ देखा।


"ख़ुशी का मौक़ा था न! आज मकान के लिए प्लॉट की रजिस्ट्री जो हुई!" कुछ इस नज़ाकत से बेगम साहिबा ने कहा कि मिर्ज़ा मासाब इस बार भी अपनी क़सम तोड़ कर ग़ोश्त खा ही लें।


"उस बेचारे को हिरन के शिकार पर जेल की सज़ा हो गई और आपको ये सब सूझ रहा है!" टेलीविजन चैनल पर समाचार तेज़ आवाज़ में सुनते-सुनाते मिर्ज़ा जी ने ग़ोश्त की कुछ बोटियां दूसरी प्लेट में सरकाते हुए कहा।


"ग़ुस्ताख़ी मुआफ़ हो हुज़ूर! घर में किसी ख़ुशी के मौक़े पर थोड़ा बहुत तो ख़ुशी से खा लिया करिये!" बेगम साहिबा ने प्लेट उठाते हुए कहा- "दिल छोटा मत करिए। आप को भी कभी शिकार का ग़ज़ब का शौक हुआ करता था। ये तो छिछोरे शौक़ीन शिकारी हैं, आप जैसे नहीं!"


मिर्ज़ा मासाब ख़ुश होने के बजाय एहसास-ए-कमतरी के साथ दस्तरख़्वान छोड़ कर टेलीविजन पर समाचार का कवरेज देखने लगे।


"इन का एहसास-ए-बरतरी है या ग़ुरूर-ए बरतरी!" कुछ यूं ही बड़बड़ाते हुए फिर वे दूसरे कमरे में चले गए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 11, 2018 at 4:24am

मेरी इस रचना पर बहुत बढ़िया टिप्पणी के साथ हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप जी।

Comment by नाथ सोनांचली on April 10, 2018 at 8:33pm

आद0 शेख शहज़ाद उसमनी साहब सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा, और समसामयिक घटना के परिपेक्ष्य में और बेहतर हो गयी है। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 9, 2018 at 3:06am

मेरी इस रचना पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब और मुहतरमा नीता कसार जी। कठिन शब्दों के अर्थ इसलिए नहीं दिये थे क्योंकि मुझे लगा कि ये तो बोलचाल के ही हैं। वैसे टिप्पणी में गूगल से साभार अर्थ की साइट लिंक अब संलग्न है यहां। सादर

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 9, 2018 at 3:01am
Comment by Nita Kasar on April 8, 2018 at 3:26pm

उर्दू के कठिन शब्दों ने कथा समझने में परेशानी पैदा की है,पाठक मन शब्दों के मकडजाल में ना उलझकर सामान्य शब्दों को आसानी से समझ पाता है ।एहसास ए बरतनी है या ग़ुरूर ए बरतनी ।ऊपर से निकल गया ।फ़िलहाल कथा के लिये बधाई आद० शेख़ शाहजाद उस्मानी जी ।

Comment by Samar kabeer on April 7, 2018 at 2:25pm

जनाब शैख़ शहज़ाद यस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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