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कविता -- अनकही ख़ामोशियाँ


अनकही ख़ामोशियाँ
बहुत कुछ कहती है
उनका शोर बहुत दूर तक सुनाई देता है
उन ख़ामोशियों की ज़मीन पे
बीज अंकुरित होते हैं
बहुत कुछ कहने के
मगर अनकही ख़ामोशियाँ
ख़ामोश बनकर रह जाती है
जैसे हड़ताल की अधूरी रह जाती है माँगें
जो कभी पूरी नहीं होती है
और माँगें हड़ताल को चलाती है
अतीत की स्मृतियों को भी
दबाती है अनकही ख़ामोशियाँ
धीरे-धीरे अनकही ख़ामोशियाँ
कब भीतर की तपिश बन जाती है
पता ही नहीं चलता है
यह तपिश
लावा बनकर फूट पड़ती है
अनकही ख़ामोशियों का
लावा पिघलना भी ज़रूरी है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on April 12, 2018 at 2:34pm

बहुत-बहुत दिली शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद साहब । लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2018 at 7:29pm

आ.जनाब आरिफ़ साहिब आदाब, अनकही खामोशियों को ज़बान अता करती सुन्दर कविता हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Mohammed Arif on April 11, 2018 at 1:14pm

आपकी टिप्पणी से लेखन को सफल बना दिया । हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by vijay nikore on April 11, 2018 at 11:44am

//मगर अनकही ख़ामोशियाँ
ख़ामोश बनकर रह जाती है
जैसे हड़ताल की अधूरी रह जाती है माँगें
जो कभी पूरी नहीं होती है// ...........

वाह, यह बहुत ही खूबसूरत ताज़ा ख़्याल है।

इस सुन्दर रचना के लिए बधाई, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on April 9, 2018 at 5:55am

आपकी इस्लाह सर आँखों पर आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । अगर इंगित कर दिया होता तो बेहतर होता ।

Comment by Mohammed Arif on April 9, 2018 at 5:54am

बहुत-बहुत दिली आभार आदरणीय नीलेश जी ।

Comment by Mohammed Arif on April 9, 2018 at 5:53am

दिली आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Samar kabeer on April 8, 2018 at 4:51pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत ही बढ़िया कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कुछ शब्दों में अनुस्वार नहीं लगे हैं,देखिये ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 8, 2018 at 11:36am

आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब 
बहुत ख़ूब रचना हुई है ,,, आप को ढेरों बधाईयाँ 
सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2018 at 11:28am

औपचारिकताओं और राजनीतिक/सामाजिक  आडंबरों की परिणति अनकही ख़ामोशियों

को इशारों में अभिव्यक्त करती बढ़िया रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और शुभकामनाएं मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब।

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