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ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है

121 22 121 22

...

ज़ुदा हुआ पर सज़ा नहीं है,
न ये समझना ख़ुदा नहीं है ।

ज़रा सा नादाँ है इश्क़ में वो,

सबक़ वफ़ा का पढ़ा नहीं है'

दिखाऊँ कैसे वो दिल के अरमाँ ,
चराग दिल का जला नहीं है ।

है दर्द गम का सफर में अब तक,
कि अश्क़ अब तक गिरा नहीं है ।

न वो ही भूले ये दिल दुखाना,
यहाँ अना भी खुदा नहीं है ।

न देना मुझको ये ज़ह्र कोई,
हुनर तो है पर नया नहीं है ।

लिपट जा आकर तू ऐ महब्बत,

जनाज़ा रुख़्सत हुआ नहीं है'

********

मौलिक व अप्रकाशित

--------हर्ष महाजन

Views: 830

Comment

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Comment by Harash Mahajan on April 28, 2018 at 7:31am

आदरणीय नवीन मणि जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 17, 2018 at 9:47pm

वाह अति सुंदर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई ।

Comment by Harash Mahajan on April 11, 2018 at 8:29pm

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी आदाब । मेरी रचना आपको पसंद आई इसजे लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ और उनीद करता हूँ आईन्दा भी आप इसी तरह आते रहेंगे ।

सादर ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 11, 2018 at 8:12pm

बहुत सी हिदायतें और कड़वे सच बयां करती छोटी बह्र पर बढ़िया रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब हर्ष महाजन साहिब।

Comment by Harash Mahajan on April 11, 2018 at 7:36pm

आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan जी।

आपकी आमद और रचना की पसंदगी के किये

तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 11, 2018 at 7:26pm

जनाब हर्ष साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Harash Mahajan on April 8, 2018 at 11:12pm

आ. राम अवध जी बहुत बहुत शुक्रिया ।

आप जूस ऊला की बात कर रहे हैं उस मुतल्लक पहले ही 

शुद्धी कर ली गयी है ।आपकी आमद के लिए पुनः ममनून हूँ सर ।

सादर ।

Comment by Harash Mahajan on April 8, 2018 at 9:13pm

आदरणीय समर सर आपकी पसंदगी मेरे लिए बहुत मायने रखती है सर ।

दोनों शेरों के मुतल्लक आपके सुझाव मुझे बहुत पसंद आये हैं । बहुत बहुत शुक्रिया सर । 

सादर ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on April 8, 2018 at 6:13pm

आदरणीय हर्ष महाजन जी ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है।ये इश्क है क्या पता नहीं है ऐसा कर सकते हैं ऊला मिसरा पर भी काम करने की आवश्यकता है।

Comment by Samar kabeer on April 8, 2018 at 6:08pm

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'ज़रा सा नादाँ है इश्क़ में वो

सबक़ वफ़ा का पढ़ा नहीं है'

'दिखाऊँ कैसे मैं दिल के अरमाँ'

'लिपट जा आकर तू ऐ महब्बत

जनाज़ा रुख़्सत हुआ नहीं है'

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