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स्वप्न मनभावन हृदय में,

रात-दिन पलता रहा.

गीत पग-पग साथ मेरे,

हर समय चलता रहा

 

पीर लिख कर कागजों में

रोज दिल अपना दुखाया.

प्रेम के दो शब्द लिखकर,

नीर आँखों से बहाया.

 

पर जमाने को निरंतर,

कृत्य यह खलता रहा.

 

धूप थी तीखी कभी फिर,

खुशनुमा मौसम हुआ.

साथ खुशियों के गमों का,

रोज ही संगम हुआ.

 

दर्द सारा प्रीत बनकर,  

गीत में ढलता रहा.

 

निज जनों से चोट खाकर,

मन कभी घायल हुआ.

फिर किसी का साथ पाकर,

प्यार में पागल हुआ.

 

आस का दीपक हमेशा,

द्वार पर जलता रहा.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 16, 2018 at 4:07pm

आदरणीय Samar kabeer जी आपके स्नेह को सादर नमन, रचना सार्थक हुई.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 16, 2018 at 4:06pm

आदरणीय Neelam Upadhyaya जी आपका तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 16, 2018 at 4:05pm

आदरणीय Shyam Narain Verma  जी आपका तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on April 10, 2018 at 6:10pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत उम्दा नवगीत रचा आपने,मज़ा आ गया,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 10, 2018 at 11:30am

आदरणीय बसंत कुमार जी बढ़िया प्रस्तुति । बधाई ।

 

पीर लिख कर कागजों में

रोज दिल अपना दुखाया.

प्रेम के दो शब्द लिखकर,

नीर आँखों से बहाया.

 

पर जमाने को निरंतर,

कृत्य यह खलता रहा.

Comment by Shyam Narain Verma on April 10, 2018 at 10:28am
बहुत सुन्दर मनभावन गीत .. बधाई  ..सादर 
Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 9, 2018 at 5:28pm

आदरणीय  TEJ VEER SINGH  जी ह्रदय से आभार आपका 

Comment by TEJ VEER SINGH on April 9, 2018 at 1:27pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी।बेहतरीन गीत।

निज जनों से चोट खाकर,

मन कभी घायल हुआ.

फिर किसी का साथ पाकर,

प्यार में पागल हुआ.

 

आस का दीपक हमेशा,

द्वार पर जलता रहा.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 9, 2018 at 12:54pm

आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी आपका बेहद शुक्रिया, आपका सुझाव बहुत अच्छा लगा, यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें, सादर नमन आपको 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 9, 2018 at 12:15pm

आ. बसन्त जी,
फिर एक बहुत उम्दा गीत पटल पर प्रस्तुत किया  आपने 
बहुत बहुत बधाई ..
मुखड़े  पग पग आने के बाद हर  समय खटक रहा है 
.

गीत पग-पग हाथ मेरा 

थाम कर चलता रहा
.

आस का दीपक सदा ही, यहाँ ही भर्ती का है ..
सदा ही को हमेशा किया जा सकता है तो देखिएगा 
.
प्रस्तुति पर बधाई 
सादर 

 

 

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